कवरेज इंडिया विशेष
गुरुकुल केवल पढ़ाई की व्यवस्था नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार, अनुशासन और चरित्र निर्माण की ऐसी भारतीय परंपरा है, जिसने पीढ़ियों को दिशा दी। ‘गुरुकुलों का महत्व- ब्रह्माण्ड से साहित्य तक’ विषय पर अपने विचार रखते हुए आचार्य धीरज द्विवेदी याज्ञिक ने गुरुकुल व्यवस्था के महत्व को ब्रह्माण्डीय चेतना से लेकर आधुनिक समाज और राष्ट्र निर्माण तक विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज जब दुनिया तकनीकी प्रगति के नए शिखर छू रही है, तब मनुष्य को केवल ज्ञान नहीं, बल्कि सही दिशा और संस्कार की भी आवश्यकता है।
ब्रह्माण्ड से साहित्य तक- गुरुकुल की व्यापक भूमिका
आचार्य धीरज द्विवेदी याज्ञिक के अनुसार भारतीय चिंतन में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं रहा। शिक्षा व्यक्ति को जीवन, प्रकृति, समाज और व्यापक सृष्टि से जोड़ने की प्रक्रिया रही है। इसी दृष्टि से गुरुकुल को समझने की आवश्यकता है।
उन्होंने वैदिक परंपरा में वर्णित ‘ऋत’ को सृष्टि की व्यवस्था से जोड़ते हुए कहा कि गुरुकुल भारतीय जीवन में ज्ञान और अनुशासन के माध्यम से इस व्यापक व्यवस्था के प्रति चेतना विकसित करने वाली संस्था रहा है।
मंत्र, साधना और अनुशासन से विकसित होती थी जीवन-दृष्टि
गुरुकुल की दिनचर्या में ब्रह्ममुहूर्त में जागरण, वैदिक मंत्रों का उच्चारण, संध्या-वंदन, अग्निहोत्र, अध्ययन और गुरु-सेवा जैसी गतिविधियों को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता था। आचार्य याज्ञिक के अनुसार इनका उद्देश्य विद्यार्थी के जीवन में अनुशासन, एकाग्रता, संयम और कर्तव्यबोध विकसित करना था।
उनका मानना है कि आधुनिक शिक्षा में तकनीकी दक्षता के साथ यदि जीवन-मूल्यों और चरित्र निर्माण को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, तो शिक्षा अधूरी रह जाएगी।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का जीवंत केंद्र
गुरुकुल परंपरा को विश्व कल्याण की भारतीय अवधारणा से जोड़ते हुए आचार्य याज्ञिक ने कहा कि भारतीय प्रार्थना परंपरा में केवल व्यक्ति या किसी एक समुदाय के कल्याण की बात नहीं होती, बल्कि समस्त प्राणियों और विश्व के कल्याण की कामना की जाती है।
उनके अनुसार यही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की मूल भावना है—जहां मानवता को विभाजित करने के बजाय समूची सृष्टि को एक परिवार के रूप में देखने की दृष्टि विकसित होती है।
राष्ट्र निर्माण के लिए चाहिए संस्कारवान नागरिक
आचार्य धीरज द्विवेदी याज्ञिक ने राष्ट्र निर्माण में गुरुकुलों की भूमिका को विशेष महत्व दिया। उनके अनुसार राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं बनता, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र, संस्कार और कर्तव्यबोध से मजबूत होता है।
उन्होंने भारतीय परंपरा में राम, कृष्ण और चंद्रगुप्त जैसे व्यक्तित्वों का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरु-शिष्य परंपरा ने ऐसे व्यक्तित्वों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिन्होंने समाज और राष्ट्र को दिशा दी।
उनके अनुसार राष्ट्रभक्ति का अर्थ केवल भावनात्मक जुड़ाव नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को समझना भी है।
गुरुकुल में धर्म किताब नहीं, जीवन का अभ्यास था
धर्म को आचरण से जोड़ते हुए आचार्य याज्ञिक ने कहा कि धर्म केवल भाषण या पुस्तकीय ज्ञान से धारण नहीं होता। उसे जीवन में उतारना पड़ता है।
उनके अनुसार गुरुकुल में प्रातःकालीन दिनचर्या से लेकर गुरु-सेवा, अतिथि-सत्कार, अध्ययन, संयम और सेवा तक अनेक गतिविधियां विद्यार्थियों को जीवन-मूल्यों का व्यावहारिक प्रशिक्षण देती थीं।
इसीलिए वे गुरुकुल को धर्म की ‘प्रयोगशाला’ के रूप में देखते हैं, जहां धर्म को केवल पढ़ाया नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारने का प्रयास किया जाता था।
आधुनिक शिक्षा के बीच सबसे बड़ा सवाल- मनुष्य कौन बनाएगा?
आचार्य याज्ञिक ने आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल भी रखा- विद्यालय डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और अन्य पेशेवर तो बना सकते हैं, लेकिन संवेदनशील और संस्कारवान मनुष्य कौन बनाएगा?
उनके अनुसार गुरुकुल का मूल उद्देश्य केवल विद्यार्थी को विद्वान बनाना नहीं, बल्कि उसे विनम्र, अनुशासित, जिम्मेदार और समाजोपयोगी नागरिक बनाना था।
उन्होंने गुरु-सेवा, श्रम, भिक्षा-चर्या और सामूहिक जीवन जैसी परंपराओं को अहंकार कम करने और विनम्रता विकसित करने की प्रक्रियाओं के रूप में प्रस्तुत किया।
भारतीय साहित्य और ज्ञान परंपरा के संरक्षण में गुरुकुलों की भूमिका
वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, व्याकरण, ज्योतिष और आयुर्वेद सहित भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण में गुरु-शिष्य परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
आचार्य याज्ञिक के अनुसार वैदिक ज्ञान का बड़ा हिस्सा मौखिक परंपरा के माध्यम से सुरक्षित रहा। गुरु बोलते थे और शिष्य उसे सुनकर कंठस्थ करते थे। इसी कारण वैदिक साहित्य को ‘श्रुति’ की संज्ञा मिली।
उनका कहना है कि गुरुकुलों ने भारतीय साहित्य को केवल सुरक्षित नहीं रखा, बल्कि उसे जीवंत परंपरा के रूप में आगे बढ़ाया।
‘गुरुकुल अतीत नहीं, भविष्य की आवश्यकता’
आचार्य धीरज द्विवेदी याज्ञिक के अनुसार गुरुकुल को केवल प्राचीन शिक्षा व्यवस्था मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आधुनिक तकनीक के दौर में भी चरित्र, अनुशासन, सेवा, संवेदना और लोकमंगल जैसे मूल्यों की आवश्यकता उतनी ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि ब्रह्माण्ड से लेकर मानव जीवन, विश्व से लेकर राष्ट्र, धर्म से लेकर समाज और साहित्य तक गुरुकुल एक व्यापक जीवन-दृष्टि को जोड़ने वाली परंपरा है।
