लक्ष्मीजी के विभिन्न स्वरूपों में छिपा है यह संदेश, पढ़िए विस्तार से

कवरेज इंडिया धर्म कर्म डेस्क

संसार में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जो लक्ष्मी की कामना न करता हो । राजा, रंक, छोटे, बड़े सभी चाहते हैं कि लक्ष्मीजी सदा उनके घर में निवास करें । लक्ष्मीजी की आराधना करने से पहले मनुष्य को उनके स्वरूप के गूढ़ अर्थ को समझ लेना चाहिए तभी वह उनकी सच्ची आराधना कर सकता है।

भगवान विष्णु के चरण दबाती महालक्ष्मी जी

महालक्ष्मी का जो चित्र हम देखते हैं उसमें वे क्षीरसागर में शेषशय्या पर विराजमान भगवान विष्णु के चरण दबाती हुई दिखाई देती हैं । पुराणों में लक्ष्मीजी का स्थान भगवान विष्णु के हृदय और चरणकमलों में बताया गया है । एक बार भगवान विष्णु की पत्नी भूदेवी ने लक्ष्मीजी से प्रश्न किया कि—‘आप विष्णु भगवान के अतिरिक्त और कहां निवास करती हैं ?’


लक्ष्मीजी ने भूदेवी को अपने निवासस्थान के बारे में बताते हुए कहा—‘मैं मधुसूदन भगवान विष्णु की अर्धांगिनी हूँ और सदा उनके पार्श्व (बगल) में स्थित रहती हूँ । जहां वे कहते हैं उनकी आज्ञा मानकर वहां चली जाती हूँ और जहां मैं जाती हूँ उसे ही लोग लक्ष्मीवान कहते हैं ।’


इसका भाव यह है कि लक्ष्मीजी विष्णु भगवान की पत्नी (भोग्या) हैं । जब साधारण मनुष्य लक्ष्मीपति बनना चाहता है तो लक्ष्मीजी उसे ठुकराकर चली जाती हैं । जो लोग भगवान की सेवा-पूजा न करके केवल लक्ष्मी की आराधना करते हैं, उनसे लक्ष्मी दूर ही रहती हैं । भगवान के चरणों का आश्रय लेने वालों पर ही लक्ष्मी अपनी कृपा बरसाती हैं और उसी घर में निवास करती हैं जहां भगवान नारायण, विष्णु, श्रीकृष्ण आदि की सेवा होती है, शंख-ध्वनि होती है । ऐसे लोगों के यहां महालक्ष्मी अपने पति भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ पर सवार होकर आती हैं । गरुड़ मंगलकारी, सौभाग्यदायक और सब प्रकार के शुभ लक्षणों से युक्त माना गया है ।

उल्लू पर सवार लक्ष्मी जी

धन-समृद्धि की कामना करने वाले लोग जब नारायण को भूलकर केवल लक्ष्मी की उपासना करते हैं तो लक्ष्मीजी उनके पास उल्लू पर सवार होकर आती हैं । पक्षियों में उल्लू को मनहूस और अमंगल की चेतावनी देने वाला माना जाता है । उल्लू पर सवार लक्ष्मी अपने साथ अनेक प्रकार की दुष्प्रवृत्तियां, बुरे व्यसन और बुरे विचार लाती हैं । प्राय: देखा जाता है कि जिन घरों में ज्यादा धन-सम्पत्ति होती है, वहां लोगों में आलसीपन, शराब, जुआ, सट्टा, चारित्रिक दुर्बलता, अहंकार, क्रोध और निर्दयता आदि बुराइयां होती है ।

लक्ष्मी जी और कमल

लक्ष्मीजी और कमल का सम्बन्ध बहुत व्यापक है । वे कमल के से रंग वाली (पद्मवर्णा) हैं, उनका मुख कमल के समान (पद्मानना) है, वे कमल के-से नेत्र वाली (कमलाक्षी) हैं । कमल का फूल सुकुमारता, उज्ज्वलता और शान्ति का परिचायक है । अत: ऐश्वर्य, समृद्धि व सौन्दर्य की कामना वाले मनुष्य को लक्ष्मी की आराधना से पहले अपने चरित्र को कमल की तरह स्वच्छ रखना चाहिए व व्यवहार में कोमलता, मृदुता, विनय, करुणा, दया व गम्भीरता जैसे गुण अपनाने चाहिए ।

कमल के आसन पर बैठी लक्ष्मी जी

लक्ष्मीजी का आसन कमल है इसलिए उन्हें कमला, पद्मा, व पद्मासना कहते हैं । कमल की नाल जल के अंदर पृथ्वी की ओर जाती है जिसका भाव है कि संसार की सारी सम्पदा (खनिज-सम्पदा, धान्य, तेल, जल, सोना, हीरा, रत्न आदि) पृथ्वी में ही छिपी है । इसीलिए पृथ्वी को रत्नगर्भा भी कहते हैं । अत: लक्ष्मी की कामना करने वाले मनुष्य को निरन्तर प्रयत्नशील रहकर पृथ्वी में छिपी अपरिमित सम्पदा प्राप्त करने की चेष्टा करनी चाहिए ।

हाथों में कमल लिए लक्ष्मी जी

लक्ष्मीजी के दोनों हाथों में कमल हैं अत: वे कमलधारिणी, पद्महस्ता, पद्महस्तिनी व पद्मयुग्मधरायै कहलाती हैं । कमल जल में उत्पन्न होता है पर जल उसे स्पर्श नहीं करता है और वह सदैव जल के ऊपर उठा रहता है । कमल की यह विशेषता निर्लिप्तता कहलाती है।


लक्ष्मीजी के हाथों में कमल का भाव यह है कि मनुष्य के पास चाहे जितना भी धन हो, उसे उसमें लिप्त नहीं होना चाहिए । जब मनुष्य में भोग-विलास की भावना होती है तो लक्ष्मी का क्षय होने लगता है । क्योंकि लक्ष्मीजी भगवान नारायण की पत्नी उनकी भोग्या हैं, मनुष्य की नहीं । अत: यदि घर में लक्ष्मी का वास हो तो मनुष्य को उनके सेवक के रूप में उनका सदुपयोग अच्छे व परमार्थ के कार्यों में करना चाहिए ।

चार हाथियों (गजराजों) द्वारा लक्ष्मी जी का अभिषेक

लक्ष्मीजी का चार हाथी अपनी सूंड़ में स्वर्ण-कलश उठाए हुए अभिषेक करते हैं अर्थात् लक्ष्मीजी के सेवक हाथी हैं । ‘हाथी पालना’ या ‘अपने दरवाजे पर हाथी बांधना’ एक प्रचलित कहावत है जिसका अर्थ है—‘बहुत मंहगा सौदा’ । हाथी पालना हर किसी के लिए संभव नहीं । लक्ष्मी के सेवक हाथी होने का भाव है कि जिन्हें समृद्धि की इच्छा हो उन्हें अपने व्यवसाय में उच्च शिक्षित और कार्यकुशल व्यक्तियों को ऊंचा वेतन देकर नियुक्त करना चाहिए क्योंकि ऐसे व्यक्ति ही अपनी ईमानदारी और सूझबूझ से व्यवसाय को चार चांद लगा देते हैं ।

मुक्त हस्त से धन वर्षा करती लक्ष्मी जी

लक्ष्मीजी के स्वरूप में उनका एक हाथ सदैव धन की वर्षा करता हुआ दिखाई देता है । इसका भाव है कि समृद्धि की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को सदैव सत्कार्यों और परोपकार के लिए मुक्त हस्त से दान देना चाहिए । दान से लक्ष्मीजी संतुष्ट और प्रसन्न होती हैं । रहीमजी का दोहा है—


पानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम ।

दोनों हाथ उलीचिए, यही सयानो काम ।।


अर्थात्—नाव में पानी और घर में पैसा बढ़ने पर उनको बाहर निकालना ही समझदारी है अन्यथा संकट का ही सामना करना पड़ेगा ।


अभय दान देती लक्ष्मी जी


लक्ष्मीजी का एक हाथ अभय मुद्रा में रहता है ।


‘क्षान्त्वा भक्तापराधान्, विहसित वदना श्रेयसां या सावित्री ।’


अर्थात्— ‘जगज्जननी माता लक्ष्मी भक्तजनों के दोषों पर ध्यान न देकर उनके अपराधों को क्षमा करके सदैव मुस्कराती रहती हैं, और उनका कल्याण कैसे करुं, यही चिन्तन करती हैं ।’


इसका भाव है कि धनी लोगों को अपने यहां काम करने वाले सभी लोगों को सुविधा, सहायता, सुरक्षा और स्नेह प्रदान करना चाहिए जिससे वे कष्ट, अभाव, चिन्ताओं और रोगों से मुक्त रह सकें । जब घर व्यापार में कार्य करने वाले प्रसन्नचित्त और अपने को सुरक्षित महसूस करेंगे तभी नौकर-मालिक के बीच द्वेष, असंतोष व अशान्ति का निराकरण होगा । शान्ति व प्रेम में ही लक्ष्मी निवास करती है, कलह में नहीं ।


प्रकाश और समृद्धि की देवी के रूप में विष्णुपत्नी लक्ष्मी का सम्बध दीपावली-उत्सव से जोड़ा गया है । इसलिए लक्ष्मी का एक नाम दीपलक्ष्मी प्रसिद्ध हुआ जिसमें उनके एक या दो हाथों में दीपक रहता है । सुख-समृद्धि की कामना रखने वालों को अपने घर का ही नहीं वरन् अपने आसपास का अंधेरा भी दूर करने का प्रयास करना चाहिए । दीपावली पर केवल अपने ही घरों में दीपक न जलाएं बल्कि मलिन बस्तियों के घरों में जहां अंधेरा हो, वहां जाकर उनके जीवन में रोशनी और खुशियां बाटें । निर्बल और असहाय मन से निकली दुआएं आपके जीवन में अवश्य खुशियां भर देगीं ।

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