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Friday, March 13

भाजपा के साथ कुंडली मिलाते केजरीवाल


शंभू शिखर। कवरेज इण्डिया न्यूज़ डेस्क। 
तीसरी बार दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद आम आदमी पार्टी के आलाकमान अरविंद केजरीवाल ने अपनी कार्यशैली पूरी तरह बदल दी है। अब वे विपक्षी खेमे का विश्वासभाजन बनने की जगह केंद्र की मोदी सरकार के साथ अपनी कुंडली का मिलान कर रहे हैं। अपने पहले और दूसरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की जंग छेड़ी थी। इसके कारण वे केंद्र सरकार और दिल्ली के उप राज्यपाल के साथ लगातार टकराव की नीति पर चल रहे थे। अब वे उनके साथ सहयोग का रिश्ता बनाकर चल रहे हैं। यह केजरीवाल का नया अवतार है।

अरविंद केजरीवाल ने एक नौकरशाह से एक्टिविस्ट और फिर एक्टिविस्ट से राजनेता बनने तक का सफर किया है। अन्ना हजारे के आंदोलन से निकलने के बाद जब उन्होंने आम आदमी पार्टी का गठन किया तब उनपर सोशल एक्टिविज्म हावी था। चुनाव जीतने और दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वे एक व्हिसिल ब्लोअर की भूमिका में थे। अपने पहले और दूसरे कार्यकाल के दौरान वे उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार और घोटालों का भंडाफोड़ कर रहे थे। उनकी पहचान एक लड़ाकु और तुनकमिजाज नेता के रूप में बन रही थी। उस दौरान उनके अंदर विपक्षी दलों का प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनने की आकांक्षा भी बलवती थी। लेकिन उन्हें यह आभास हो गया कि वहां इसके दावेदारों के बीच सर-फुड़व्वल की स्थिति है और उनके सर्वमान्य नेता बनने की गुंजाइश नहीं है तो उन्होंने अपना रास्ता अलग कर लिया। इस बीच धीरे-धीरे उनके एक्टिविज्म पर राजनीतिक समझ की परत चढ़ने लगी।

उन्होंने अनावश्यक बयानबाजी बंद कर दी और जन समस्याओं के समाधान की दिशा में सक्रिय हो गए। दिल्ली की जनता को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना उनकी प्राथमिकता बन गई। तीसरी बार उनकी प्रचंड बहुमत के साथ जीत का यही आधार बना। वे समझ गए कि जनता का विश्वास हासिल करने के जरिए ही वे आगे की यात्रा जारी रख सकते हैं। यह बात भी समझ चुके थे कि फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर मोदी सरकार का कोई विकल्प नहीं है। वे राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी बन चुके थे। इसबार की सफलता के बाद उनका लक्ष्य दिल्ली को दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर बनाना है। उन्हें पता है कि यह केंद्र सरकार के सहयोग के बिना संभव नहीं है। वे समझ चुके हैं कि केंद्र सरकार और एलजी के साथ टकराव के जरिए वे कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे। न जनता को सहूलियतें दे सकेंगे और न कोई रचनात्मक कार्य कर सकेंगे। इसीलिए उन्होंने भाजपा की नीतियों का समर्थन करना शुरू कर दिया।

चुनाव के दौरान भाजपा नेताओं ने उनपर जितना भी कीचड़ उछाला, जितने भी आरोप लगाए उनका उन्होंने बड़ी शालीनता के साथ जवाब दिया। चुनाव जीतने के साथ ही उन्होंने घोषणा कर दी कि वे मोदी सरकार के साथ मिलकर दिल्ली का विकास करेंगे। इसी नीति के तहत शपथ ग्रहण के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के साथ औपचारिक मुलाकात की। दिल्ली हिंसा के दौरान अमित शाह की आपात बैठकों में शामिल हुए। भाजपा के किसी नेता पर दंगा भड़काने का आरोप नहीं लगाया। उनकी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन पर दंगे में शामिल होने का आरोप लगा तो उनका बचाव करने की जगह तत्काल पार्टी से निकाल दिया और उन्हें दुगनी सज़ा देने को कह दिया। इसके साथ ही जेएनयू में देशविरोधी नारेबाजी को लेकर कन्हैया, उमर खालिद समेत दस लोगों के खिलाफ देशद्रोह के मुकदमा चलाने की अनुमति से संबंधित एक साल से लंबित फाइल का निपटारा कर अनुमति प्रदान कर दी। यह तमाम नेता भाजपा की आंख की किरकिरी बने हुए थे और दिल्ली सरकार के पास फाइल लंबित होने के कारण कानूनी कार्रवाई नहीं कर पा रहे थे।

दिल्ली विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद जब उत्तर पूर्वी दिल्ली के इलाकों में हिंसा फैली तो उन्होंने मोदी सरकार पर निशाना साधने से परहेज़ किया। नेताओं के भड़काऊ बयानों पर कोई टिप्पणी नहीं की। चाहे वह भाजपा के कपिल मिश्रा हो या ओवैसी की पार्टी के वारिस पठान उन्होंने कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की। दिल्ली में हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों ने उनकी आम आदमी पार्टी को वोट दिया था। वे चाहते तो दोनों समुदायों के लोगों को समझा-बुझाकर मामला शांत करा सकते थे। लेकिन उन्होंने केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को अपने ढंग से मामले को निपटाने का मौका दिया और इसमें अपनी तरफ से हर संभव सहयोग दिया। स्वयं उपद्रवग्रस्त इलाकों का दौरा करने नहीं गए। शांति की अपील की भी तो राजघाट पहुंचकर महात्मा गांधी की समाधि के सामने।

दिल्ली चुनाव के दौरान केजरीवाल ने सिर्फ अपने काम के आधार पर मतदाताओं का समर्थन मांगा। किसी दल के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की। भाजपा नेताओं ने शाहीनबाग को चुनावी मुद्दा बनाया था। उन्होंने केजरीवाल को शाहीनबाग के धरने का प्रायोजक और संरक्षक तक बताया। प्रति धरणार्थी 5 सौ रुपये और बिरयानी की व्यवस्था करने का आरोप लगाया। उन्हें आतंकवादी तक करार दिया। लेकिन केजरीवाल न तो कभी शाहीनबाग गए और न ही अपने स्वभाव के अनुरूप उत्तेजित हुए। न तो प्रदर्शन का खुला समर्थन किया न विरोध। कालिंदी कुंज की सड़क खुलवाने के सवाल पर भी उन्होंने कहा कि पुलिस केंद्र सरकार के पास है वह जब चाहे खुलवा ले। उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। 
उत्तर पूर्वी दिल्ली में हिंसा का दौर थमने के बाद केजरीवाल ने मृतकों और घायलों को तुरंत लंबे चौड़े मुआवजे की घोषणा कर दी। साथ ही दंगे में शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई पर सहमति व्यक्त की। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा के साथ न कोई राजनीति होनी चाहिए न समझौता।

सबसे बड़ी बात है कि मुस्लिम समुदाय का एकमुश्त वोट मिलने के बावजूद उन्होंने स्वयं के अनिश्वरवादी या धर्मनिरपेक्ष होने का ढोंग नहीं रचाया। वे चुनाव के दौरान और मतगणना के बाद हनुमान मंदिर गए। न्यूज चैनल पर खुलकर हनुमान चालीसा का पाठ किया। उन्होंने उदार हिन्दुत्व के प्रति अपनी आस्था प्रदर्शित की।
इसबार उन्होंने अपने पास कोई मंत्रालय नहीं रखा है। उन्होंने स्वयं को  केंद्र के साथ समन्वय और विकास कार्यों की निगरानी के लिए मुक्त रखा है। 2014 के केजरीवाल और आज के केजरीवाल में भारी अंतर है। पहले वे एक आंदोलनकारी थे अब राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी बन चुके हैं।

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