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Sunday, January 12

यज्ञ और हवन का वैज्ञानिक आधार


कवरेज इण्डिया न्यूज़ डेस्क। 
एक किलोग्राम लकड़ी जलने पर 130 ग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड, 51 ग्राम हाइड्रोकार्बन, 21 ग्राम पार्टिकुलेट मैटर, 0.3 ग्राम पॉलीसाइक्लिक एरोमेटिक हाइड्रोकार्बन और 10 से 167 मिलीग्राम डोक्सिन उत्पन्न होता है। अंतिम दो रसायन कैंसरजनक हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित हो जाती है, जो तापमान वृद्धि के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है। मगर, यह सिर्फ लकड़ी जलाने पर होता है। हवन की प्रक्रिया में कई अन्य सामग्री भी शामिल की जाती है।

हवन, यज्ञ का छोटा रूप है। किसी भी पूजा व जाप आदि के बाद अग्नि में दी जाने वाली आहुति की प्रक्रिया हवन के रूप में प्रचलित है। आप इसे अपने परिवार के साथ कर सकते हैं।

यज्ञ एक अनुष्ठान होता है और वह किसी खास उद्देश्य से ही किया जाता है। इसमें देवता, आहुति, वेद मंत्र, ऋत्विक और दक्षिणा अनिवार्य होता है। हवन हिंदू धर्म में शुद्धीकरण का एक कर्मकांड है।

हिंदू धर्म ग्रंथों में यज्ञ और हवन की अग्नि को ईश्वर का मुख माना गया है। इसमें जो कुछ आहुति यानी कि खिलाया जाता है, वास्तव में ब्रह्मभोज है। धर्म ग्रंथों में मनोकामना पूरा करने के लिए या बुरी घटना टालने के लिए यज्ञ और हवन किया जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी हवन और यज्ञ इंसान और प्रकृति दोनों के लिए काफी फायदेमंद हैं।

राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान (NBR) संस्थान द्वारा किए गए एक शोध में पता चला है कि यज्ञ और हवन के दौरान उठने वाले धुएं से वायु में मौजूद हानिकारक जीवाणु 94 प्रतिशत तक नष्ट हो जाते हैं। साथ ही इसके धुएं से वातावरण शुद्ध होता है और इससे बीमारी फैलने की आशंका काफी हद तक कम हो जाती है।

शोध में पता चला है कि हवन और यज्ञ का धुआं वातावरण में 30 दिन तक बना रहता है और इस समय में जहरीले कीटाणु नहीं पनप पाते। धुएं से न सिर्फ मनुष्य के स्वास्थ्य पर अच्छा असर पड़ता है बल्कि यह खेती में भी काफी असरकारी साबित हुआ है। खेतों में मौजूद कीटाणु इसके धुएं से नष्ट हो जाते हैं।

मनुष्य को दी जाने वाली दवाओं की तुलना में यज्ञ और हवन के धुआं काफी लाभकारक है। इसके घुएं से शरीर में पनप रहे रोग खत्म हो जाते हैं। जबकि दवाओं का कुछ न कुछ दुष्प्रभाव जरूर होता है।

हवन और यज्ञ में जाने वाले पदार्थ के मिश्रण से एक विशेष तरह का गुण तैयार होता है, जो जलने पर वायुमंडल में एक विशिष्ट प्रभाव पैदा करता है। वेद मंत्रों के उच्चारण की शक्ति से उस प्रभाव में और अधिक वृद्धि होती है। वैज्ञानिक अभी तक कृत्रिम वर्षा कराने में सफल नहीं हुए हैं लेकिन देखा गया है यज्ञ और हवन द्वारा यह संभव हो पाया है। कई लोग वर्षा कराने के लिए हवन और यज्ञ का सहारा लेते हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार फ्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की, जिसमें उन्हें पता चला कि हवन मुख्यत: आम की लकड़ी से किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है जो खतरनाक जीवाणुओं को मारकर वातावरण को शुद्ध करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसके बनने का तरीका पता चला। गुड़ को जलाने पर भी यह गैस उत्पन्न होती है। टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गई अपनी रिसर्च में ये पाया कि यदि आधा घंटा हवन में बैठा जाए अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टायफाइड जैसे खतरनाक रोग फैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

जैसा कि ऊपर मैंने बताया कि हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर रिसर्च की। उन्होंने ग्रंथों में वर्णित हवन सामग्री जुटाई और जलने पर पाया कि यह विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी शोध किया और देखा कि सिर्फ एक किलो आम की लकड़ी जलने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलाई गई, एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद जीवाणुओं का स्तर 14 प्रतिशत कम हो गया।

उन्होंने कक्ष की हवा में मौजूद जीवाणुओं का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाजे खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के 24 घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से 96 प्रतिशत कम था।  बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था। रिपोर्ट में लिखा गया कि हवन द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों, फसलों को नुक्सान पहुंचाने वाले जीवाणुओं का नाश होता है जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है।

लखनऊ के इन वैज्ञानिकों की रिसर्च रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र में दिसंबर 2007 में प्रकाशित हो चुकी है। रिपोर्ट में भी यही लिखा गया कि हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों एवं फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का भी नाश होता है, जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है।

कहवन की समिधा (जलने वाली लकड़ी) के रूप में आम की लकड़ी सर्वमान्य है परन्तु अन्य समिधाएं भी विभिन्न कार्यों के लिए प्रयुक्त होती हैं। सूर्य की सीमा मदार की, चंद्रमा की पलाश की, मंगल की खैर की, बुध की चिड़चिड़ा की,  बृहस्पति की पीपल की, शुक्र की गलूर की, शनि की शमी की, राहू की दूर्वा की और केतु की कुशा की समिधा कही गई है। मदार की समिधा रोग का नाश करती है, पलाश की सब कार्य सिद्ध करने वाली, पीपल की प्रजा (सन्तति) का काम कराने वाली, गूलर की स्वर्ग देने वाली, शमी की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु देने वाली और कुशा की समिधा सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाली होती है।

हव्य (आहुति देने योग्य द्रवों) के प्रकार: प्रत्येक ऋतु में आकाश में भिन्न-भिन्न प्रकार के वातावरण रहते हैं। सर्दी, गर्मी, नमी, वायु का भारीपन, हल्कापन, धूल, धुआं, बर्फ आदि का भरा होना। विभिन्न प्रकार के कीटाणुओं की उत्पत्ति, वृद्धि एवं समाप्ति का क्रम चलता रहता है इसलिए कई बार वायुमंडल स्वास्थ्यकर होता है। कई बार अस्वास्थ्यकर हो जाता है। इस प्रकार की विकृतियों को दूर करने और अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए हवन में ऐसी औषधियां प्रयुक्त की जाती हैं जो इस उद्देश्य को भली प्रकार पूरा कर सकती हैं।

होम द्रव्य: होम द्रव्य अथवा हवन सामग्री वह जल सकने वाला पदार्थ है जिसे यज्ञ (हवन/होम) की अग्रि में मंत्रों के साथ डाला जाता है।

सुगंधित: केसर, अगर, तगर, चंदन, इलायची, जायफल, जावित्री, छड़ीला, कपूर, कचरी, बालछड़, पानड़ी आदि।

पुष्टिकारक: घृत, गुग्गल, सूखे फल, जौ, तिल, चावल, शहद, नारियल आदि।

मिष्ट: शक्कर, छुहारा, दाख आदि।

रोग नाशक: गिलोय, जायफल, सोमवल्ली, ब्राह्मी, तुलसी, अगर तगर तिल, इंद्र जौ, आंवला, मालकांगनी, हरताल, तेजपत्र, प्रियंगु केसर, सफेद चंदन, जटामांसी आदि। उपरोक्त चारों प्रकार की वस्तुएं हवन में प्रयोग होनी चाहिएं।

अन्न के हवन में मेघ-मालाएं अधिक अन्न उपजाने वाली वर्षा करती हैं। सुगंधित द्रव्यों से विचार शुद्ध होते हैं। मिष्ट पदार्थ स्वास्थ्य को पुष्ट एवं शरीर को आरोग्य प्रदान करते हैं इसलिए चारों प्रकार के पदार्थों को समान महत्व देना चाहिए। यदि अन्य वस्तुएं उपलब्ध न हों तो जो मिले उसी से या केवल तिल, जौ, चावल से भी काम चल सकता है।

यज्ञ अथवा अग्निहोत्र आज केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रह गया है। यह शोध का विषय भी बन गया है। ‘अमेरिका’ में यज्ञ पर शोध हुए हैं और प्रायोगिक परीक्षणों से पाया गया है कि वृष्टि, जल एवं वायु की शुद्धि, पर्यावरण संतुलन एवं रोग निवारण में यज्ञ की अहम भूमिका है।

चेचक के टीके के आविष्कारक डॉ. हैफकिन का कथन है ‘घी जलाने से रोग के कीटाणु मर जाते हैं।’ फ्रांस के वैज्ञानिक प्रो. ट्रिलबिर्ट कहते हैं, “जली हुई शक्कर में वायु शुद्ध करने की बड़ी शक्ति हैं। इससे टी. बी., चेचक, हैजा आदि बीमारियां तुरंत नष्ट हो जाती हैं।” अंग्रेजी शासनकाल में मद्रास के सेनिटरी कमिश्नर डॉ. कर्नल किंग आई.एम.एस. ने कहा, “घी और चावल में केसर मिलाकर अग्नि में जलाने से प्लेग से बचा जा सकता है।”

आज अत्यधिक धुम्रपान, अंधाधुंद पेट्रोलियम पदार्थों के प्रयोग से बढ़ता प्रदूषण तथा विषैली गैसें चिंता का विषय, जिसका प्रतिकार यज्ञ है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. स्वामी सत्यप्रकाश ने भी कहा है, “यज्ञ में बहुत स्वास्थ्यप्रद उपयोगी ओजोन तथा फारमेल्डिहाइड गैसें भी उत्पन्न होती हैं। ओजोन ऑक्सीजन से भी ज्यादा लाभकारी एवं स्वास्थ्यवर्द्धक है। यह ठोस रूप में प्रायः समुद्र के किनारे पाई जाती है, जिसे हम अपने घर में ही यज्ञ से पा सकते हैं।”

डॉ0 सुनीता मिश्रा, पर्यावरण विशेषज्ञ का कहना है कि अनगिनत अज्ञात सूक्ष्म जीवाणु हमारे चारों तरफ वातावरण में और हमारे रोमकूपों, रक्त और जोड़ों में रहते हैं। हवन द्वारा इन सभी का नाश होता है। तपेदिक, चेचक, मलेरिया आदि का इलाज हवन से संभव है। यज्ञ अथवा अग्निहोत्र आज केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रह गया है। यह शोध का विषय भी बन गया है। ‘अमेरिका’ में यज्ञ पर शोध हुए हैं और प्रायोगिक परीक्षणों से पाया गया है कि वृष्टि, जल एवं वायु की शुद्धि, पर्यावरण संतुलन एवं रोग निवारण में यज्ञ की अहम भूमिका है।

टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

फ्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की, जिसमें उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि आखिर हवन में आम की लकड़ियों का ही प्रयोग क्यों किया जाता है? उन्होंने शोध में पाया कि आम की लकड़ी जलने पर फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड गैस पैदा करती है। यह खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है तथा वातावरण को शुद्ध करती है।

प्रस्तुत जानकारी के लिए मैंने कई देशी विदेशी श्रोतों में उपलब्ध ज्ञान का यथास्थान उपयोग किया है।

                          

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