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Sunday, December 1

प्रयागराज। बलात्कार, हत्या, शोषण, आखिर लड़कियों को समझते क्या हैं लोग


कवरेज इण्डिया न्यूज़ डेस्क प्रयागराज। 
इस समय हैदराबाद की डॉक्टर व झारखंड की आदिवासी लड़की के साथ हुए बलात्कार का मामला गरम है। इस पर महिला छात्रावास गेट पर प्रदर्शन व सभा आयोजित कर महिलाओं को बराबरी और बेख़ौफ़ आज़ादी पर जोर दिया गया। महिला छात्रावास परिसर गेट पर हैदराबाद की डॉक्टर को बलात्कार कर जलाए जाने के ख़िलाफ़ और झारखण्ड की आदिवासी बच्ची के जघन्य बलात्कार के खिलाफ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों समेत शहर के नागरिक समाज के साथियों द्वारा विरोध प्रदर्शन एवं प्रतिरोध सभा हुई।

इस सभा का संचालन नीलम सरोज ने किया। उन्होंने स्त्रियों के लिए असुरक्षित समाज पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अक्सर लड़कियों के कपड़ों को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है जबकि यौन हिंसा के ज़िम्मेदार पुरुषों के अंदर की बलात्कारी मनोवृत्ति है। चारुलेखा ने कहा कि सड़कों पर लड़ी जाने वाली लड़ाई के साथ-साथ हमें चाहे वो स्त्री हो या पुरुष अपने अंदर के मर्दवाद से भी लड़ना होगा। स्त्री विरोधी फिल्मी गीतों और चुटकुलों का विरोध करते रहना होगा। सौम्या ने कहा कि बलात्कारियों को फांसी ही देना समस्या का हल नहीं होगा क्योंकि अगर बलात्कार और हत्या की सज़ा एक कर दी जाए तो बलात्कारी स्त्रियों को डर से कत्ल करना क्रूरतापूर्ण जलाना बेहतर समझेगा लेकिन, न्याय इस तरह से नहीं मिलेगा क्योंकि बलात्कार सिर्फ वह नहीं होता जो शरीर पर किया जाए, स्त्रियों को मानसिक रूप से यह एहसास कराना कि उनकी कीमत एक उपभोग्य वस्तु की तरह है वे निरीह और आश्रित हैं यह भी बलात्कार  है।

कैम्पसों में सक्रिय महिला सेल व जस्टिस वर्मा कमिटी की सिफारिशों को लागू किए बिना हम न्याय की ओर कदम नहीं बढ़ा पाएंगे। मुक्ता कुशवाहा ने बहुत ही संवेदनपूर्ण तरीके से समझाने की कोशिश की कि आज का हमारा समाज किस तरह से स्त्री विरोधी होता जा रहा है और उपेक्षित समुदायों के लिए सुरक्षा एक बहुत बड़ा मुद्दा है जिसमें स्त्री के साथ हो रहा अन्याय सबसे ज़्यादा गहराया है। सुरुचि जो कि शिआट्स की छात्रा हैं। उन्होंने कहा कि स्त्रियों की इज़्जत बहन या मां के रूप में नहीं व्यक्ति के रूप में होनी चाहिए लेकिन सत्ता हमें ऐसे जीने नहीं देना चाहती। हम सभी को इंसानी मूल्यों को एक बार फिर से अपने अंदर जगाने की ज़रूरत है।

साथी शिवा ने बताया कि कैसे सामंतवादी पूंजीवादी समाज व निजी संपत्ति ने शताब्दियों से ही स्त्रियों को गुलाम बनाए रखा है इसीलिए हमारी असली लड़ाई सामंतवादी पूंजीवादी व्यवस्था से है।
इस विरोध प्रदर्शन में स्त्री और पुरुष दोनों ही मौजूद थे तथा महिलाओं की भागीदारी भी सराहनीय थी। इन साथियों के अलावा साथी ऋतु शाह, श्वेता, राधिका, शक्ति, सुरेंद्र राही, अनिरुद्ध, सुनील मौर्य,  अखिल विकल्प, सूर्या आदि मौजूद रहे।

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