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Friday, October 4

पत्ता रोजी, पत्ता आवास, कितना हुआ मुसहरों का विकास


- मुख्यधारा से दूर मुसहर जाति के लोग, आज भी उदासीनता के शिकार

कवरेज इण्डिया के लिए, भगवान प्रसाद उपाध्याय /इंद्रजीत मिश्र की विशेष खबर
प्रयागराज। सड़क के किनारे पत्ती औऱ फटे पुराने कपड़ो की झोपड़ी ताने जमीन पर लेटे, बैठे पत्तल बनाते और उनके अर्धनग्न टहलते हुए बच्चों को देखकर सहज की अनुमान लगाया जा सकता है कि आज भी शंकरगढ क्षेत्र में निवास करने वाले मुसहर जाति के लोग मुख्य धारा से कोसों दूर हैं। कहने को तो सरकारें साल दर साल गरीबी उन्मूलन पर करोड़ों खर्च करती हैं, लेकिन गरीबी उन्मूलन का हिस्सा इन तक पंहुच नही पाता या पंहुचाने का प्रयास नहीं किया जाता जो विचारणीय प्रश्न है।

शिक्षा विभाग 14 साल तक बच्चों के लिए अनिवार्य तथा निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था का दम भरता जरूर  है , लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि दिन भर अपने परिजनों के साथ पत्तियां तोड़ते, शादी समारोहों में पत्तल उठाते इन अर्धनग्न मुसहरों के बच्चों को कितना शिक्षित या जागरूक करने का प्रयास किया गया। सच तो यह है कि सड़क के किनारे घास फूस तथा फटे पुराने कपड़ों की झोपड़ी में ये मुसहरे ठंडी, गर्मी बरसात सहते हुए तंगहाली का जीवन जीने को मजबूर हैं और आज भी रूखी सूखी खाना या भूखे ही सो जाना इनका नसीब बन चुका है।
   
विकासखण्ड शंकरगढ के , शिवराजपुर, बसहरा,भांडिवार , बेरुई, कटरा, टंडन वन, नौढिया, भांडिवार आदि ग्राम सभाओं में निवास कर रहे मुसहरों का जीवन देखकर कंही से नही लगता कि इनकी तरफ जन प्रतिनिधि या सरकारें ध्यान देती होंगी।

आवास शौचालय व अन्य बुनियादी सुविधाओं से मरहूम इन लोगों का आज तक राशन कार्ड तो दूर की बात है , मददाता पहचान पत्र तक नहीं बन पाया है। इन सबका जिम्मेदार कौन है कोई नही जनता। प्रश्न खड़ा होता है कि सड़क के किनारे झोपड़ी में निवास करने वाले इन लोगों का क्या कोई अधिकार नही है। क्या इनका राशन कार्ड बनाकर इन्हें मिलने वाली सरकारी सुविधा देकर इनका जीवन स्तर नही सुधारा जा सकता। क्या मिट्टी धूल खेलने वाले बच्चों को जागरूक बनाकर शिक्षित नही किया जा सकता। अब देखने वाली बात होगी कि सड़क के किनारे झोपड़ी ताने तंगहाली का जीवन जीते हुये इन मुसहर जाति का तारणहार कब आता है।

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