प्रयागराज। अवैध खनन का निकला दिवाला; किसी की पौ बारा , तो किसी का छिना निवाला - COVERAGE INDIA

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Monday, October 21

प्रयागराज। अवैध खनन का निकला दिवाला; किसी की पौ बारा , तो किसी का छिना निवाला


डॉ भगवान प्रसाद उपाध्याय एवं इंद्रजीत मिश्रा की खोजी खबर, कवरेज इण्डिया न्यूज़ डेस्क। 
प्रयागराज। जनपद प्रयागराज सहित उत्तर प्रदेश के कई जिलों की अनेकों तहसीलों में इन दिनों कई जगहों पर बालू खनन हो रहा है। ऐसा भी नही है कि ये कोई नई बात है । ये  अरसे से हो रहा है, जिसमे  बारा तहसील के अंतर्गत शंकरगढ़ , बारा, लालापुर भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है, इसी प्रकार मेजा के परानीपुर में करछना के डीहा में और   बीकर व महेवा आदि स्थानों  मैं वर्षों से अवैध बालू खनन का कारोबार हो रहा है  l कहना न होगा कि इस काले सोने के कारोबार में ऊपर से लेकर नीचे तक के लोग लिप्त हैं। या यूं कहें कि अरसे से लोगों की जीविका का साधन बालू खनन ही रहा है। ज्ञात हो कि बालू खनन अधिकांशतः लोगों द्वारा अपनी जमीनों पर या रॉयल्टी देकर अन्य लोगों की जमीनों पर कराया जाता  है ।

 यंहा ये कहना उचित होगा कि कुछ लोगों का तरीका कानून से इतर हो सकता है  लेकिन गौरतलब ये है कि यही बहुत से क्षेत्रों समेत अधिकांशतः शंकरगढ़ विकासखंड के लोगों का मुख्य व्यवसाय है। इसी से लोगों का दो वक्त का खाना जुटता है। इसी से मिलने वाली कमाई से लोग अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं। देखा जाय तो  शंकरगढ़ क्षेत्र की सिलिका सैंड तथा गिट्टी  की मांग अन्तर्राज्यीय स्तर पर बहुत अधिक है , और ये यंहा निकलने वाली सिलिका और गिट्टी के पत्थरों की वशेषता के कारण ।

 अब सवाल उठता है कि हो रहे इन बालू खनन को अवैध बताकर बंद कराना कंहा तक उचित है। अक्सर खनन की टीम आती है, एक दो दिन हल्ला गुल्ला मचाती है और सिस्टम बनाकर चली जाती है। नतीजा?वही ढाक के तीन पात। हां ये सत्य है कि हो रहा यह खनन कानून के हिसाब से पूरी तरह अवैध है। लेकिन जब इतनी खपत है, इतनी बड़ी मात्रा में वासिंग प्लांटो पर धुलाई होती है तो क्या इसे कानूनी प्रक्रिया से वैध करके राजस्व नही कमाया जा सकता? क्या कानूनी प्रकिया से वैध करके सिलिका का बड़ा कारोबार कर देश प्रदेश में नाम नही कमाया जा सकता? क्या कानूनी प्रक्रिया से वैध करके जरूरत मंदो को रोजगार नही दिया जा सकता? ये सब संभव है लेकिन फिर बीच वाली कमाई नही होगी।

कहने को तो ये भी कहा जा सकता है कि लीज दी गई है उसी पर खनन वैध है । करें , लेकिन क्या ये हकीकत है? क्या जिनको खनन का पट्टा दिया गया है वही पूरी आपूर्ति करते हैं? क्या जंहा लीज दी गई ये सारा बालू वंही से निकलता है? क्या रवन्ना का सही परिचालन हो रहा है? जी नही यंहा तो "कंही का ईंट कंही का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा " की कहावत चरितार्थ हो रही है। ऐसा भी नही है कि इलाकाई पुलिस हाँथ पर हाँथ धरे बैठी है। इलाकाई पुलिस द्वारा इस संबंध में समय समय पर कार्रवाई की जाती है। लेकिन पुलिस के अधिकारों का भी एक दायरा है।
 
प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या जांच में आने वाली टीमों ने दिए हुए पट्टे या जारी रवन्ना के हिसाब से बालू के भंडारण की कभी जांच कराने की कोशिश की?क्या जांच में वाली टीमों ने दी हुई लीज और बालू भंडारण व सप्लाई की जाने वाली सिलिका के क्वालिटी की जांच लीज में निकलने वाली बालू से की  ?शायद नही। की है तो सिर्फ , खाना पूर्ति। की है तो सिर्फ गरीबों की दो जून की रोटी को बंद करने का काम।  मैं यह नही कहता कि लोग अवैध खनन करें। मेरे कहने का यह आशय है कि जब कानून का डर दिखाते हैं , हाई कोर्ट के ऑर्डर का हवाला देते हैं तो क्या केवल असहाय , बेसहारा मजदूरों तक ही उनका रौब क्यों सीमित हैं ? वास्तव में यदि अवैध खनन बंद कराना है तो अवैध या बिना मानक के चल रहे धुलाई और ढुलाई केंद्रों की जांच करें।

वास्तव में यदि अवैध खनन बंद कराना है तो बिना रवन्ना के व गैर लीज से परिवहन करते बालू व वाहन के साथ मालिको की जांच करें। न रहेगा बांस , न बजेगी बांसुरी । अभी 3 महीने पहले केंद्रीय प्रदूषण की टीम द्वारा इलाके में आकर वाशिंग प्लांट ओं का निरीक्षण किया गया था। जिसमें कहा गया कि 87 वाशिंग प्लांटों में से सिर्फ 12 वाशिंग प्लांट वैध है । शेष को बंद करने की तथा जुर्माने की नोटिस थमा कर इतिश्री कर ली गई । लोगों का कहना यह था कि हम लोग 2 जून की रोटी के लिए हउदी नुमा चरही बनाकर अपनी जमीन से बालू निकालकर उसके मिट्टी कंकड़ आज निकालने का काम करते थे , लेकिन साजिशन हम लोगों को भारी-भरकम जुर्माने की नोटिस दी गई जो पूरी तरह से गलत है। जबकि वर्तमान में संचालित हो रहे वाशिंग प्लांट पर कोई भी कार्यवाही करने को तैयार नहीं है । कारण जो भी हो लेकिन हकीकत यही है कि जब सन 2012 के न्यायालय के आदेश के बाद क्षेत्रीय किसान व मजदूर द्वारा बालू का काम बंद कर दिया गया है तो उन्हें जुर्माने की नोटिस देना पूरी तरह से गलत है जबकि इन बड़े  संचालकों पर कोई कार्यवाही करने को तैयार नहीं है ,जो कि मानक के विपरीत चल रहे हैं।

कहने का आशय यह है कि केवल गरीबों को परेशान करके अवैध खनन बंद नही किया जा सकता । लोगों का कहना है कि जड़ पर वार करिये या 20 साल से रिफायनरी के लिए अधिग्रहीत जमीनों को किसानों को लौटकर उन्हें छोटे छोटे पट्टे आबंटित कीजिये। जिला पंचायत सदस्य जमील खान बताते हैं कि हम लोगों ने रिफायनरी चालू न करने की स्थिति में किसानों को उनकी जमीन लौटने के लिए दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन भी किया लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।
गौर तलब है कि बालू खनन को अवैध बताकर गरीबों की रोजी रोटी बंद करना कंहा तक उचित है, ये तो नही कहा जा सकता लेकिन इनकी रोजी रोटी के लिए कोई ठोस उपाय निकाला जा सकता है। अगर निकल रहे सिलिका को अवैध की संज्ञा दी जा रही है तो इनका इतने पड़े पैमाने पर भंडारण व परिवहन कैसे हो रहा है। मतलब सिर्फ ये है कि जब यंहा के सिलिका की इतनी मांग है तो उसे वैध करने के उपायों पर विचार क्यो नही किया जाता।
 
बारा का किसान हमेशा से छला ही गया है । आज भी शंकरगढ़ के खान सेमरा,मिश्रापुरवा, कपारी, कपसो, मलपुर, अमिलहाई, लकहर,जोरवत,लाला का पुरवा, हिनौती , तालापार, चुंदवा, शिराजपुर,रमना,बड़गडी, बिहारिया,गोलाइया, अभयपुर सहित सैकड़ों गांव ऐसे हैं जंहा सिंचाई का कोई साधन नही है। खेत तो पर्याप्त है लेकिन नाम मात्र का। सिंचाई के साधन न होने के कारण लोग वर्ष भर खेती नही कर पाते। समय समय पर विभिन्न सरकारों द्वारा बुलेखण्ड के नाम पर विशेष पैकेज देती रही हैं। पैसा भी खूब निर्गत हुआ लेकिन क्या इन गांवों की हालत सुधरी? जी नही। बल्कि और बद से बदतर हो गई। कारण?पहले इतनी मंहगाई नही थी मेहनत मजदूरी करके यंहा का किसान किसी तरह दो जून की रोटी का जुगाड़ कर लेता था, लेकिन अब जबकि इन्ही कामो के लिए ज्यादा पैसे की आवश्यकता है तो वह कंहा से लाएगा?,अपने बच्चों को कैसे पढ़ायेगा?अपने बेटी-बेटा की शादी कैसे करेगा? क्या बालू खनन पर उंगली उठाने वाले कभी इस बात पर भी गौर किये हैं।
 
बालू खनन की अगर बात की जय तो आपको बताना चाहूंगा कि लगभग 20 साल पहले भारत पेट्रोलियम निगम की तरफ से बारा तहसील की  बीसों गांवों की लगभग 4500 एकड़ जमीनों का अधिग्रहण किया गया था। हैरत की बात है कि आज तक इन जमीनों पर भारत पेट्रोलियम निगम की तरफ से न तो भारत सरकार की तरफ से किसी प्रकार का निर्माण कार्य प्रारंभ हो सका, जबकि लोगो की जमीन भारत पेट्रोलियम निगम के नाम चढ़ गई। उस समय भुखमरी की मार झेल रहे किसान मजदूरों ने औने पौने दाम  रुपये  में खुशी खुसी इसलिए इन जमीनों को भारत सरकार की दे दिया कि हमारे क्षेत्र में बड़ी फैक्टरी लगेगी, हम लोगों को रोजगार मिलेगा,हमारे भी बच्चे पढ़ सकेंगे, हम भी दो जून की सकून की रोटी खा सकेंगे। लेकिन हुआ क्या ?सिफर।
   
बुंदेलखंड से प्रभावित इस क्षेत्र का किसान मात्र ठगा गया। जो किसानों की जमीनें खेती करने लायक बची थी उसे 2007 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने उद्योगपतियों से मिलकर थर्मल पॉवर प्लांट के लिए अधिग्रहण कर लिया। अर्थात रही सही कसर 2007 में पूरी हो गई। यंहा उल्लेख करना जरूरी है कि थर्मल पावर प्लांट में लगभग 817 किसानों की जमीनों का अधिग्रहण हुआ था । बारा पावर प्लांट की वर्तमान स्थिति यह है कि 1980 मेगा वाट का यह थर्मल प्लांट बनकर तैयार है। विद्युत का उत्पादन भी हो रहा है। प्लांट में  लगभग 200  किसानों या उनके पाल्यों को दैनिक भुगतान पर रोजगार दिया गया है। जो नाकाफी साबित हो रहा है।
   इन किसानों की वर्तमान स्थिति यह है कि किसान के हांथों से रिफाइनरी और पावर प्लांट की वजह से जमीन निकल चुकी है। जो बची है उस पर पानी के अभाव में खेती नही कर सकता। तो वो खाये क्या?जिये कैसे?पाल्यों का भरण पोषण करे तो कैसे? मात्र एक विकल्प; खनन।
   
खनन को अवैध की संज्ञा देने वाले जिम्मेदारों से पूंछना है कि 20 साल अधिग्रहीत जमीनों में जब तेल शोधक कारखाना नही बना तो उनकी जमीने वापस कर उन्हें छोटे छोटे खनन पट्टे क्यों नही दिए जाते। क्या उससे राजस्व नही आएगा। गौरतलब है कि खनन तो 40 -50 सालों से होता आ रहा है।पहले खनन की लीज राजमाता राजेन्द्र कुमारी के नाम से बनी थी, लोग रॉयल्टी दे कर अपनी जमीनों पर गिट्टी बालू तोड़कर भरण पोषण करते थे। यह कहना जरूर सही है कि वर्तमान समय की जो स्थिति है उससे तो राजस्व का नुकसान हो रहा है , लेकिन विचारणीय ये है कि खनन करने वालों या कराने वालों का लीज में लगने वाले पैसे से कंही ज्यादा खर्च लगता है। लोगों से बात करने पर साफ भी हुआ कि वे छोटे छोटे खनन के पट्टे लेकर खनन करके राजस्व देना चाहते हैं । इस आशय से समंबन्धित कागजात , आवेदन आदि समंबन्धित विभाग के साथ कोर्ट में भी दिया गया है लेकिन आज तक उस पर कोई ध्यान नही दिया गया।

 सवाल खड़ा होता है कि जब राजकोष में खनन का पैसा जमा नही होता तो जाता कान्हा है? इसका उल्लेख करना यंहा उचित नही है, हकीकत सबको पता है। गौरतलब ये है कि यदि किसानों , मजदूरों, भू स्वामियों को छोटे छोटे पट्टे खनन के के लिए आबंटित कर दिए जांय तो उससे उनका जीवन भी सुचारु रूप से चलेगा और राजस्व वृद्धि से साथ बीच की लूट खसोट भी बंद हो जाएगी। इस विश्लेषण से ये बातें तो साफ हो जाती है कि अभी तक हारा है तो केवल किसान। हारा है तो केवल गरीब। हारा है तो केवल मजदूर । हारा है तो केवल असहाय। जीता प्रशासन भी नही जीतते आये हैं तो सिर्फ विभाग में बैठे बीच के अधिकारी और बड़े कारोबारी।

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