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Wednesday, October 30

वह फैसला जिसने मुलायम सिंह को बना दिया था 'मुल्ला मुलायम'


कवरेज इण्डिया न्यूज़ डेस्क। 
राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले पर इन दिनों देश की सियासत गरमाई हुई है और सभी को इस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार है. 29 साल पहले आज ही के दिन जब कारसेवक बाबरी मस्जिद की तरफ बढ़ रहे थे, तो उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सख्त फैसला लेते हुए कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया. इसमें पांच कारसेवकों की मौत हो गई थी.
मुलायम सिंह के इस कदम से बाबरी मस्जिद तो उस समय बच गई, लेकिन भारतीय राजनीति की दशा और दिशा हमेशा के लिए बदल गई. बीजेपी को यहीं से राजनीतिक संजीवनी मिली. जबकि मुलायम सिंह यादव की छवि हिंदू विरोधी बन गई. हिंदूवादी संगठनों ने उन्हें 'मुल्ला मुलायम' के नाम से नवाजा. ये हिंदू विरोधी छवि अब तक मुलायम सिंह और उनकी समाजवादी पार्टी से पूरी तरह हटी नहीं है.

कारसेवकों पर चलवा दी गोली
बता दें कि 90 के दशक में अयोध्या आंदोलन पूरे चरम पर था और उत्तर प्रदेश की सत्ता की कमान मुलायम सिंह यादव के हाथ में थी. मुलायम ने बयान दिया था कि उनके मुख्यमंत्री रहते हुए बाबरी मस्जिद पर कोई परिंदा पर भी नहीं मार सकता. अक्टूबर, 1990 में हिंदू साधु-संतों कारसेवा के लिए अयोध्या कूच कर रहे थे. 30 अक्टूबर 1990 को कारसेवकों की भीड़ बेकाबू हो गई. कारसेवक पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ मस्जिद की ओर बढ़ रहे थे. मुलायम सिंह यादव ने सख्त फैसला लेते हुए प्रशासन को गोली चलाने का आदेश दिया. पुलिस की गोलियों से पांच कारसेवकों की मौत हुई.

30 अक्टूबर को मारे गए कारसेवकों के चलते लोग गुस्से से भरे थे. आसपास के घरों की छतों तक पर बंदूकधारी पुलिसकर्मी तैनात थे और किसी को भी बाबरी मस्जिद तक जाने की इजाजत नहीं थी. ऐसे में 2 नवंबर 1990 को एकबार फिर हजारों कारसेवक हनुमान गढ़ी के करीब पहुंच गए, पुलिस को एक बार फिर गोली चलानी पड़ी,जिसमें करीब एक दर्जन कारसेवकों की मौत हो गई.

देश की एकता के लिए चलवाई गोली
अयोध्या में कारसेवकों पर गोलीकांड के 23 साल बाद मुलायम सिंह यादव ने  जुलाई 2013 में आजतक से बात करते हुए कहा था कि उस समय मेरे सामने मंदिर-मस्जिद और देश की एकता का सवाल था. बीजेपी वालों ने अयोध्या में 11 लाख की भीड़ कारसेवा के नाम पर लाकर खड़ी कर दी थी. देश की एकता के लिए मुझे गोली चलवानी पड़ी. हालांकि, मुझे इसका अफसोस है, लेकिन और कोई विकल्प नहीं था.

'मुलायम सिंह बन गए 'मुल्ला मुलायम'
मुलायम सिंह यादव ने अपनी सख्ती से उस समय बाबरी मस्जिद भले ही बचा ली, लेकिन इसी के बाद से उत्तर प्रदेश से लेकर देश की सियासत हमेशा के लिए बदल गई. इस घटना के चलते बीजेपी और हिंदूवादी संगठनों ने मुलायम सिंह यादव को हिंदू विरोधी करार दिया. बीजेपी नेता अपने भाषणों में कारसेवकों पर गोली चलवाने के चलते मुलायम को 'मुल्ला मुलायम' कह कर संबोधित करते थे. उन्हें हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त नेता को तौर पर पेश करते. मुलायम सिंह 29 साल के बाद भी अपनी ये छवि पूरी तरह तोड़ नहीं सके हैं.

1991 में लोकसभा चुनाव हुआ तो बीजेपी 85 से बढ़कर 120 सीट पर पहुंच गई. इतना ही 1991 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हुआ तो मुलायम सिंह बुरी तरह हार गए और बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब रही. कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. 1992 में कारसेवक एक बार फिर से अयोध्या में जुटने लगे 6 दिसंबर 1992 को वही प्रशासन जो मुलायम के दौर में कारसेवकों के साथ सख्ती बरते था,  मूकदर्शक बन गया. कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी.

कल्याण सिंह ने कुर्बान की सरकार
कल्याण सिंह ने इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए 6 दिसंबर, 1992 को ही मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया. दूसरे दिन केंद्र सरकार ने यूपी की बीजेपी सरकार को बर्खास्त कर दिया. कल्याण सिंह ने उस समय कहा था कि ये सरकार राम मंदिर के नाम पर बनी थी और उसका मकसद पूरा हुआ. ऐसे में सरकार राममंदिर के नाम पर कुर्बान. यूपी की कल्याण सरकार भले बर्खास्त हो गई हो, लेकिन बीजेपी की राजनीति को देश भर में संजीवनी दे गई.

बीजेपी को राममंदिर से संजीवनी
1980 में बीजेपी का गठन हुआ और पार्टी के बनने के बाद ही उसने खुलकर राम मंदिर आंदोलन का मोर्चा संभाला. बीजेपी के गठन के 4 साल बाद चुनाव हुए तो पार्टी के केवल दो सांसद जीते. 1989 में बीजेपी ने पालमपुर अधिवेशन में राम मंदिर आंदोलन को धार देने का फैसला किया.  उधर राजीव गांधी ने विवादित स्थल के पास राम मंदिर का शिलान्यास करने की इजाजत दे दी.

इसका फायदा भी बीजेपी को मिला. बीजेपी 1989 के लोकसभा चुनाव में 2 सीट से बढ़कर 85 पर पहुंच गई.  मार्च 1990 में मध्य प्रदेश और राजस्थान में बीजेपी की सरकार बनी. बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी को जबरदस्त राजनीतिक फायदा मिला. बीजेपी 85 सीट से बढ़कर 120 पर पहुंच गई. इसके बाद 1996 में चुनाव में हुए तो केंद्र में बीजेपी सरकार बनी हालांकि ये महज 13 दिन चली. इसके बाद 1998 और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी, जो 2004 तक चली.

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