जरूर पढ़ें, पवन तिवारी के शीघ्र प्रकाशित होने वाले उपन्यास 'त्यागमूर्ति हिडिम्बा' का एक अंश....... - COVERAGE INDIA

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Friday, August 23

जरूर पढ़ें, पवन तिवारी के शीघ्र प्रकाशित होने वाले उपन्यास 'त्यागमूर्ति हिडिम्बा' का एक अंश.......

फोटो- पवन तिवारी

लेखक- पवन तिवारी। 
घर पहुँचने पर हिडिम्बा ने देखा कि, भ्राता हिडिम्ब द्वार पर ही सावधान की मुद्रा में खड़े हैं. हिडिम्बा को समझते देर न लगी कि भाई इस समय क्रोध के वश में है. इसलिए हिडिम्बा ने बिना किसी वार्ता या अभिवादन के चुपचाप सर झुकाकर घर के भीतर प्रवेश करने की चेष्टा की, कि तभी हिडिम्ब ने लपककर हिडिम्बा के लम्बे केशों का निचला छोर पकड़ लिया. एक हल्की सी आधी चीख बाहर निकल कर मर गयी.

हिडिम्ब अकड़ते हुए क्रोध में बोला – हिडिम्बे, तू इस प्रकार मुझसे आखें चुराकर नहीं जा सकती. मुझे तुझसे कुछ पूछना है ? मेरे प्रश्नों के उत्तर दिए बिना तेरा गृह प्रवेश वर्जित है. हिडिम्बा ने भाई के आक्रामक भाव को भांपते हुए धैर्य और नम्रता के साथ कहा – हे भ्राता श्री ,मैं अवश्य ही आप के प्रश्नों का उत्तर दूंगी. परन्तु क्या इस प्रकार अपनी छोटी बहन के केश पकड़ना आप को शोभा देता है. इस प्रकार की शालीनता पूर्वक, बिना आवेश हिडिम्बा के ऐसा कहने पर, हिडिम्ब लज्जित होकर तुरंत केशों को अपने हाथो के बंधन से मुक्त कर दिया. किन्तु अगले ही क्षण उसने गरजते हुए कहा – हिडिम्बे, तू ऐसे तुच्छ प्रसंग से मुझे भरमा नहीं सकती, मेरा प्रयास तो बस तुझे रोकना था. ताकि मैं तुझसे कुछ पूछ सकूँ.

पहले ये बता, तू कहाँ गयी थी ? हिडिम्बा ने बिना भय के सहजता से कहा – हे भ्राताश्री मैं विहार करने गयी थी और आप से अनुमति लेकर ही गयी थी. शायद अधिक मदिरा पान के प्रभाव से आप को विस्मृत हो गया हो. हिडिम्बा से ऐसी वाणी सुनकर हिडिम्ब अपनी लज्जा छुपाते हुए निर्लज्जता से बोला- ‘हिडिम्बे’ मद्यपान तो हमारी दिनचर्या का नियमित हिस्सा है. ये हमारी पेय संस्कृति का अभिन्न अंग है. इससे मुझ पर कोई विशेष प्रभाव नहीं होता. ये साधारण मानवों को भ्रमित कर सकता है. हिडिम्ब को नहीं, मैं उसे पीता हूँ, वो मुझे नहीं. तूँ चन्द्रमा के सौन्दर्य की आभा को निहारने गयी थी और शीघ्र वापस आने की बात कही थी. पर तू पूरी रात नहीं लौटी और अब दोपहर हो चुकी है.

आज - कल तूँ पहले की अपेक्षा अधिक भ्रमण करने लगी है. क्या कारण है ? कहीं तुझे किसी राक्षस, मानव अथवा यक्ष से प्रेम तो नहीं हो गया है. यदि है तो मुझे स्पष्ट बता दे, अन्यथा यदि मुझे बाद में ज्ञात हुआ तो, तेरे उस प्रेमी के प्राण हरने से उसे कोई नहीं बचा सकेगा. मेरे प्रण का अपमान मुझसे सहन नहीं होगा. यदि तूने मेरी प्रतिज्ञा का उपहास किया, उसके विरुद्ध जाकर कार्य किया तो, मैं तेरे प्राण लेने से भी संकोच नहीं करूँगा. तू मुझसे सत्य कह ‘हिडिम्बे’, तू पूरी रात और अब तक कहाँ थी. हिडिम्बा ने परिस्थिति को भाँपते हुए शांत स्वर में उत्तर दिया- ‘हे भ्राता’ कल रात्रि मैं चन्द्रमा की धवल आभा से उपजे सौन्दर्य की छटा को निहारते हुए दूर निकल गयी थी.

घूमते - घूमते मैं एक सुंदर झरने के पास पहुँच गयी. शुक्ल पक्ष के इस चन्द्रमा की धवल कान्ति में अरण्य की नीरवता को वेधती झरने की स्वर लहरी ने मन मोह लिया. मुझे हल्की थकान के साथ प्यास का अनुभव हुआ, मैंने झरने का मीठा जल पिया. उसके उपरान्त वहाँ की एक सुंदर फटिक शिला पर बैठ कर झरने के सौन्दय को निहारने लगी, झरने की अल्हड़ता से उभरती स्वर लहरियों ने ऐसी तान छेड़ी की मुझे बैठे - बैठे कब निद्रा आ गयी, मुझे पता ही नहीं चला. जब तक कि सूर्य की तीव्र किरणें मेरे शरीर को ऊष्मा से वेधने न लगीं. मेरी निद्रा भंग हुई तो सूर्य ऊपर चढ़ आया था. ऐसे में पास बहते झरने को देख मेरा मन जल क्रीड़ा करने को हुआ. सो मैं जल क्रीड़ा करने लगी, कि तभी मुझे आप का ध्यान आया कि भ्राता श्री मुझे न पाकर परेशान होंगे.

इसलिए मैं तीव्र गति से दौड़ती हुई आयी हूँ. इसलिए शरीर में गर्मी का प्रभाव बढ़ गया है. फलस्वरूप शरीर में पसीने की बूँदें आप देख सकते हैं. तू ये कैसी बातें कर रही है ‘हिडिम्बे’ भ्राताश्री और फलस्वरूप, तू तो ऐसे मुझसे नहीं बोलती थी, प्रकार की बोली तो मानवों की है. कहीं तूँ किसी मानव के प्रेम में तो नहीं पड़ गयी है. इसीलिये तुझे अब मानवों के माँस में रूचि नहीं रही. भइया आप तो मानवों के शरीर की गंध दूर से ही पहचान लेते हैं, क्या मेरे शरीर से मानव की गंध आ रही है ? रही बात मानव से प्रेम की तो, मैं किसी साधारण मानव से कैसे प्रेम कर सकती हूँ ? मैं आप की बहन हूँ.

मैं उसी से प्रणय या विवाह का विचार मन में लाऊँगी जो बल और बुद्धि में आप से भी अधिक सामर्थ्यवान हो. हिडिम्बा के मुँह से इस प्रकार की वाणी सुनकर पहली बार हिडिम्ब ठठा कर हँसा और बोला – ‘हे हिडिम्बे’ तूँ सचमुच बहुत भोली है. इस अरण्य क्या, इस जगत में कोई ऐसा नहीं है, जो मुझसे अधिक बलशाली हो, रही बात बुद्धिमत्ता की तो मेरी मायावी शक्तियों के आगे सारी की सारी बुद्धि विफल हो जायेगी. फिर कोई भी हो, मेरे भय से अच्छे - अच्छे शूरवीर यहाँ आने से डरते हैं. फिर साधारण मानव की क्या बिसात. यक्ष भी मेरे सम्मुख आने का साहस नहीं कर पाते.

हाँ, मायावी कृष्ण का नाम बहुत सुना है. कुछ लोग तो उसे भगवान कहते हैं. वो कभी मिले तो शायद मेरे बल और बुद्धि की सही परीक्षा हो सके, वैसे भी मुझे उससे अपने पूर्वजों की हत्या का बदला लेना है और तो कोई दूसरा मेरी दृष्टि में नहीं आता. इसी बात की मुझे चिंता है ‘हिडिम्बे’. मुझे ऐसा कठिन प्रण नहीं करना चाहिए था. यदि हमारे समाज का कोई युवा मेरे थोड़ा भी समकक्ष हुआ तो मैं तेरा विवाह उससे कर दूँगा. किन्तु उसे मुझसे पहले मल्ल युद्ध करना होगा. ताकि मैं उसके बल और बुद्धि की सही परीक्षा ले सकूँ कि वो विपत्ति काल में मेरी बहन की रक्षा करने में समर्थ होगा या नहीं. वैसे भी मेरी बहन से मानव तो क्या, कोई दैत्य भी सहजता से पार पा नहीं सकता. मेरे कठोर वचनों के लिए मुझे क्षमा करना हिडिम्बे . मैं तेरा जीवन सुखमय देखना चाहता हूँ, परन्तु मेरे विश्वास के साथ घात मत करना. क्योंकि मैं छल को, झूठ को, सहन नहीं कर सकता.

फिर ऐसे में क्रोध आना स्वाभाविक है और तू तो मेरी बहन है. मेरे स्वभाव से भली - भाँति परिचित है. इसलिए हे ‘हिडिम्बे’ तू कोई भी ऐसा कार्य न करना, जिससे मुझे क्रोध आये. ऐसे में मैं, अपने आप से बाहर हो जाता हूँ. अब तूँ जाकर विश्राम कर. मुझे क्षुधा व्याप्त हो रही है. इसलिए अब मैं भोजन की खोज में जा रहा हूँ. हिडिम्बा बोली- एक बात पूछूँ भइया, बुरा तो नहीं मानेंगे. हिडिम्बा के मुख पहली बार ऐसी बात सुनकर हिडिम्ब ठठाकर हँसा, पूछ हिडिम्बे, शीघ्र पूछ, मेरी क्षुधा बढ़ती जा रही है. भइया आप मानवों के प्रति इतना बैर का भाव क्यों रखते हैं. वे तो आप के सामने निरीह हैं. हिडिम्बा के मुख से इस प्रकार की बात सुनकर हिडिम्ब फिर ठठाकर हँसा और बोला- हिडिम्बे, तू बहुत भोली है रे. तुझे पता नहीं ये मानव कितने मायावी हैं और इन मानवों ने हमें तीनों लोकों में मायावी घोषित करा रखा है.

इन्हीं मानवों ने राक्षस जाति के बारे में सम्पूर्ण जगत में दुष्प्रचार कर रखा है कि हम गंदे, मूर्ख, दुष्ट, अतिवादी, झूठे, धूर्त, विधर्मी और हिंसक हैं. ऐसे ही मिथ्या प्रचार के कारण आज राक्षस जाति पृथ्वी की समस्त जातियों एवं सभ्यता से कट कर इन भयानक वनों में रहने को विवश है. राक्षस ही एक मात्र ऐसी जाति थी जो न केवल मानवों, बल्कि देवताओं से भी, न केवल स्पर्धा कर सकती थी बल्कि अपनी बुद्धिमता और शक्ति से पछाड़ सकती थी. इसीलिये देवों ने पहले मानवों को हमारे विरुद्ध भड़काया और इन मानवों ने समस्त पृथ्वी वासियों को, हमारे विरुद्ध भड़काकर पृथ्वी के सभी महत्वपूर्ण संसाधनों पर अधिपत्य कर लिया. आज पूरी मानव जाति हमसे घृणा करती है.

अब जब ये पृथ्वी के समस्त संसाधनों को साध लिए हैं तो एक मात्र बचे हुए वनों के संसाधनों को भी निगल जाना चाहते हैं. सिंह, रीक्ष और व्याघ्रों के भय से ये नहीं आते अन्यथा अब तक ये इस अरण्य का भी विनाश कर दिए होते. ये पशु ही हमारे सच्चे मित्र हैं. मृत्यु का भय होना आवश्यक है हिडिम्बे, जिस दिन भय समाप्त, उसी दिन ये मानव इन वनों को भी समाप्त कर देंगे. जब तक ये वन हैं, तभी तक हम स्वतंत्र है. वन खत्म, हम खत्म. इस अरण्य से बाहर जो भी पशु पक्षी या जीव हैं सब मानवों के दास हैं. जिस गाय को वे माता कहते हैं. उसी गाय का दूध उसके बछड़े को नहीं पीने देते. स्वयं के लिए निकाल लेते हैं. ऐसे धूर्त हैं ये मानव. भैसों, साड़ों, हाथियों, बंदरों, ऊंटों, बकरियों को दास बनाकर बाँध कर रखते हैं.

सर्पों को टोकरियों में बंद रखते हैं. यहाँ तक कि अपने मनोरंजन के लिए बेचारे शुक पक्षियों तक को पिंजरें में बंद रखते हैं. कबूतरों को अपने मायाजाल में फँसाकर संदेशवाहक बना रखा है. स्वानों पर तो ऐसे मायाजाल किया है कि वे इनके पहरेदार बन बैठे हैं और उल्टा इन मानवों ने हमें मायावी घोषित कर रखा है. इसलिये इन मानवों के प्रति मेरे मन में बैर का भाव रहता है. वास्तव में ये ही राक्षस जाति के सबसे बड़े बैरी हैं. अब तो तेरी समझ में आ गया होगा हिडिम्बे. हिडिम्बा ने धीरे से कहा- हाँ भइया, तू इन मानवों के मायाजाल में मत फँसना, समझी. मैं चलता हूँ, भूख असहनीय होती जा रही है. इतना कहकर हिडिम्ब चला गया. हिडिम्बा थोड़ी सहज हुई यह सोचकर कि संकट तो टला, किन्तु अगले ही क्षण ख़याल आया कि वो लौट आया तो. उसका कोई भरोसा नहीं. विचारों की बाढ़ सी आ गयी.

हिडिम्बा बड़ी देर खड़ी - खड़ी सोचती रही. माता पिता का तो स्नेह मिला नहीं. एक भाई विधाता ने दिया तो इतने कठोर मन वाला. बचपन से इसके हाथों से मार खाते – खाते एक भरी पूरी स्त्री हो गयी और आज तक वो मार खाना, वो भय बना हुआ है. पूरे अरण्य पर रौब झाड़ता रहता है. सब पीड़ितों और प्रताड़ितों की तरह स्वयं को असहाय मानते हैं. कोई इसे क्षण भर के लिए देखना नहीं चाहता. सब विवश, सब असहाय. इसके ही कारण सब मुझसे भी कटे - कटे रहते हैं. अरण्य का राजा, बस आदेश देने के लिए, दूसरों पर धौंस के लिए. न्याय के लिए नहीं, समस्याओं के निदान के लिए नहीं, बस अधिकार का राजा, दायित्वों का नहीं. धिक्कार है ऐसे राजा और भाई पर. मेरे भविष्य का क्या होगा ? इसी विचार के मध्य उसे पुनः कपिराज की कही बातें स्मृति हो आयी.

जिससे हिडिम्बा को मानसिक रूप से सम्बल मिला. पर अगले ही क्षण दूसरा विचार आया कि जाने कब कपिराज का कहा वाक्य सत्य में परिवर्तित होगा. हिडिम्बा ने पुनः मन ही मन स्वयं को समझाने का प्रयास किया. जो विधाता ने लिखा है वही होगा और फिर जब कपिराज ने कहा है तो अवश्य सत्य होगा. ऐसे ही इतने दिन व्यतीत कर लिए बिना किसी आशा के, अब तो एक आस है. उस आस की प्रतीक्षा में शेष उम्र काट लूँगी. यही सोचकर हिडिम्बा अपने शयन कक्ष की तरफ बढ़ चली.


 लेखक का परिचय-

पवन चिंतामणि तिवारी
(साहित्य अकादमी से सम्मानित) 

आपका पहला चर्चित कहानी संग्रह ''चवन्नी का मेला'' 2005 में प्रकाशित. 

वर्ष 2016 में उपन्यास ''अठन्नी वाले बाबूजी'' अनुराधा प्रकाशन दिल्ली से  प्रकाशित. 

देश भर की पत्र पत्रिकाओं में 1500 से अधिक लेख ,कहानियाँ, कवितायें प्रकाशित हो चुकी हैं साथ ही आप फिल्म राइटर्स एशोसिएशन के सदस्य भी हैं। 

सम्प्रति- देशभर में कविता पाठ, स्वतंत्र लेखन एवं हिन्दी और पत्रकारिता के विकास व उन्नयन के लिए देश भर में वक्तव्य, सेमीनार  व भ्रमण. 

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