भोजपुरी हमार माई भाषा ह - राकेश तिवारी 'बबलू' - COVERAGE INDIA

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Sunday, August 18

भोजपुरी हमार माई भाषा ह - राकेश तिवारी 'बबलू'

राकेश तिवारी 'बबलू'

कवरेज इण्डिया के लिए मंगला तिवारी की विशेष रिपोर्ट। 
भोजपुरी हमार माई भाषा ह्अ और अपने माई भाषा के सम्हाल के, सजा के संवार के रखना हमारी जिम्मेदारी है अलग बात है कि उसी भाषा को कुछ लोग  नीचे और नीचे गिराने पर तुले हुए हैं। "मैं राम के देश का वासी हूँ" गीत में अपने देश के साथ ही भाषा की पराकाष्ठा उजागर हुई है और जाहिर हुई है मेरे मन की मंशा। बड़े ही संघर्षों के बाद गुरुजी स्वामी श्री स्वर्गानन्द जी महाराज और माता रानी की कृपा के बाद आज मुझे ये मुकाम हासिल हो पाया है - राकेश तिवारी "बबलू"।
 
जिस प्रकार अलंकार रहित साहित्य, बरसात झूला कजरी रहित सावन, बसंत रहित मौसम, खुशबू हरियाली रहित उपवन का अपना कोई वज़ूद नहीं ठीक वैसे ही संस्कार, संस्कृति रहित समाज का वज़ूद भी शून्य हो जाता है। किसी ने कहा भी है- जिस समाज को पंगु बनाना हो वहाँ के कला, संस्कार और संस्कृति धीरे-धीरे भ्रष्ट कर दो समाज स्वत: ही नष्ट हो जायेगा। आज अपने समाज, भोजपुरिया समाज के साथ यही हो रहा है, भाषा अपभ्रंश होती जा रही है। इतर भाषी लोग इसे हेय दृष्टि से देखते हैं बल्कि भोजपुरी भाषी लोग भी काफी हद तक सहमें हुए हैं मौज़ूदा दौर के अश्लील व असंस्कारी गीतों से, कारण कि अपने भाषा में जो अच्छा लिखा, पढ़ा, गाया जा रहा है उसकी पहुँच कम है, उसका प्रचार कम किया जा रहा है और पहले से ही ऐसी बातें फैला दी जाती है कि लोग गूगल पर भोजपुरी गीत सर्च करने से कतराते हैं और कोई हिम्मत करके सर्च भी कर लेता है तो ऐसे गंदे फूहड़ गीतों के बोल व बीडियो दिखाई दे जाते हैं कि आदमी उस शब्द से डर जाता है जो सर्च किया गया था।

हम आने वाला दिनों में भोजपुरी को इसी जकड़न से मुक्त करवाने का बेड़ा उठाये हैं और कसम खाये हैं कि अपने गीतों से अपने भाषा को झुकने नहीं देंगे। हम ऐसे गीत गाते हैं और गाते रहेंगे जिसको एक बार फिर से पूरा परिवार साथ बैठ के सुन सके। उनका गाया गीत "ये मेरा उत्तर प्रदेश है" भाषा के कसाव के साथ ही एक ऐतिहासिक गीत बन कर उभरा है आगे चलकर इसे "उत्तर प्रदेश गान" के रूप में पहचाना जायेगा इतना इस गीत में कुव्वत है। और हाँ सफर पर चलने के पूर्व मैं आपको बता देना चाहूँगा कि तिवारी जी के लगभग सभी गीत कुछेक को छोड़ कर स्वामी श्री स्वर्गानन्द जी के लिखे गीत हैं जिनका आशीर्वाद हमेशा से राकेश जी पर बना हुआ है जिनका जिक्र आगे चलकर किया जायेगा। पहले सुबह-शाम गीत लग जाते थे लोग गीत सुनकर मंत्रमुग्ध हुए जाते थे गीत के बहाने लोग एक दूसरे के यहाँ घण्टों बिता दिया करते थे गीतों पर समीक्षात्मक चर्चा करते थे पर अब तो गीत ईयरफोन के माध्यम से कानों तक सिमट गया है लोगों का नजरिया बन गया है कि ईयरफोन लगा मतलब बंदा भोजपुरी फूहड़ गीत जरूर सुन रहा होगा यही मानसिकता बदलनी है हमें, मैने ऐसा सपना संजोया है कि भोजपुरी से अश्लीलता नदारत हो जाय भोजपुरी फिर से पुरानी महक, सौंदर्य, मिठास के साथ हाजिर हो, लोक गायक राकेश तिवारी "बबलू" जी जो बचपन से ही माँ दुर्गे के भक्त हैं का कथन है और उनके गीत उनके इस कथन को सजदा कर फिर से महफिलों को सजाने लगे हैं।

शिक्षा तो महज बारह तक ही है पर उनके गाये गीत संसार को शिक्षा देने के मामले में बहुत ही आगे निकल गये हैं जिसका मनोवैज्ञानिक असर इतना गहरा है कि कहा ही नहीं जा सकता उनका गीत "ऊ अभागा होई जेकरा के माई नाही बा" यथार्थता के इतने नजदीक हैं कि श्रोता के मन में गहराई तक उतर जाता है संगीत समाज को रुला देने में सक्षम हुआ है वातावरण की सजगता दर्द के अतल गहराइयों की अनुभूति उनके गीतों को कालजयी बना दने में सफल हुई है। एक बच्चा या बड़े भी, जिसकी माँ अब इस दुनिया में नहीं है उसकी दुनिया किस तरह निरीहता के गोंद में चली जाती है किस तरह उसे हर तरफ चाहे वह धरती हो अम्बर हो सूरज, चंदा, पवन का झोका हो शून्य ही शून्य नजर आता है यहाँ एक बात स्पष्ट तरीके से रखी जा सकती है ऊ का जानइ पीर पराई जाके पाँव न फटी बेवाई, महतारी रहित जीवन कितना भयकारी, कष्टकारी या वज़ूद रहित हो जाता है यह वही जान सकता है जो इस आपदा को भुगत चुका है उनके इस गीत में दर्द फटे हुए बादल की भाँति बरस पड़ा है। 

इनका गाया गीत "भोजपुरिया माटी" इतना हिट हुआ कि लोगों के जुबाँ चढ़ कर बोल रहा है इसका टिक-टाॅक वर्ज़न भी खूब हिट रहा इस गाने को सुनकर भोजपुरिया लोग इतराये बिना नहीं रह पाये। आज जब पलायनवाद बिकरालता की तरफ बढ़ता जा रहा है खेती-किसानी पैसौं की रखैल बन कर रह गई है, मतलब साफ है कि खेती में भी जेब ढीली करनी पड़ रही है और किसानी से लोगों का मोहभंग होता जा रहा है रोजी-रोटी के तलाश में लोग अपना घर परिवार गाँव समाज छोड़ के शहरों की तरफ भाग रहे हैं, शांति खोते जा रहे हैं, अंधी दौड़ में शामिल होते जा रहे हैं, कंक्रीट के जलते हुए जंगल में तपते हुए जीवन यापन करने को मजबूर हैं और चाह कर भी अपने जमीन से जुड़ाव नहीं रख पा रहे हैं, कुछ तो मजबूरी बस और कुछ शौकिया अपना गाँव छोड़ रहे हैं उन सबों के लिए इनका गीत "सुख त्अ गाँऊ में बा" सूख-चैन पोषक औषधि का काम करती हुई प्रतीत हुई है।

जहाँ एक तरफ भोजपुरी में अश्लीलता की बाढ़ सी आ गई है फूहड़ता चरम पर है जिसके खिलाफ सरकार भी धीरे-धीरे सख्त हो रही है कार्यवाही का असर भी दिखने लगा है ऐसे समय में ये गीत अंतरात्मा को सुकून पहुँचाती सी हाजिर हुई है गाँव और शहर का तुलनात्मक अध्ययन इतनी बारीकता से किया गया है कि वातावरण जीवंत हो उठे, आवाज मिठास और शालीनता की परिचायक बन पड़ी है। गीतकार भी ढेर सारे बधाई के पात्र है और आने वाला समय उनकी ओर टकटकी लगाये हुए है कि आप समाज को ऐसा कुछ और दें जो भोजपुरी के लिए सिरमौर हो सके राकेश तिवारी जी ने एक सपना देखा था कि मैं भोजपुरी में पाँच हजार से अधिक गीत गाऊँ और ऐसे गीत गाऊँ जो समाज की आवाज़ बन सके जिसमें शालीनता, संस्कृति, संस्कार फलदार वृक्षों की भाँति उपस्थिति हो और माँ दुर्गा की कृपा से उनका सफर सफलता की तरफ उन्मुख भी है, हालांकि सन्तुष्टि नहीं है उनको अपने गाये गीतों से, यानि प्यास अभी बाकी है और प्यास है तो जीवन है, चाह है, अभिलाषा है। प्यास अंतिम समय तक बनी रहे ताकि समय-समय पर एक से बढ़कर एक गीत भोजपुरी समाज को मिलता रहे और आप सफलता का एक नया शिखर गढ़ें जहाँ तक पहुँचना अभी तक किसी के लिए संभव न रहा हो आप ऐसे परिवेश की रचना करें जहाँ पहुँच कर भोजपुरी आप पर गर्व कर सके और गर्व करे पूरा भोजपुरी समाज।

उनका सपना मैं एक भी ऐसा गीत नहीं गाउंगा जिससे हमारी भाषा को शर्मसार होना पड़े को भी संजोये रखना ऐसा उम्मीद है समाज को।
चले थे अकेले पर आज कारवाँ बढ़ता ही जा रहा है अपने गीतों के सफर में ये सबसे पहले माँ दुर्गे के गाँव के उस मंदिर के आभारी हैं जहाँ भक्तिमय माहौल ने इन्हें यहाँ तक पहुँचाने में सहायता की उसके बाद ये आभार व्यक्त करते हैं गीतकार बिपिन बहार जी का जो अब बाबा स्वर्गानंद के रूप में असहाय गरीब बच्चों के लिए उनके हित में काम कर रहे हैं राकेश जी को इस मुकाम तक लाने में इनका योगदान महत्वपूर्ण है, अनमोल है। अभी हाल ही में सीता हरण प्रसंग पर आया राकेश जी का एक गीत इतना पसंद किया जा रहा है जिसका ओरइछोर नहीं है भोजपुरी में सीताहरण प्रसंग पर इससे पहले ऐसा गीत सुनने को नहीं मिला। अंजन जी का लिखा गीत "जवान सुगना" भी पिछले दिनों रिलीज हुआ और खूब पसंद किया गया।

शब्दों की सीमा को देखते हुए कई गीतों पर नहीं लिख पा रहा हूँ बाकि फिर कभी मौका देखकर लिखा जायेगा। रही बात गुरु-शिष्य के गीतों की तो कह सकते हैं कि इनके पास गीतों की खान है जहाँ एक से बढ़कर गीत, आये दिन हम सभी को सुनने को मिल रहे हैं। रिच म्युजिक भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है भोजपुरी के इस पावन गीत-पर्व को उल्हासमयी बनाने में। ये कारवाँ ऐसे ही बढ़ता रहे और जैसे मुझे मालूम चला है कि आने वाले नवरात्र के पावन पर्व पर ढेर सारे गीत एक से बढ़कर एक रिलीज होंगे के लिए अग्रिम बधाई के साथ भोजपुरी के सुधी श्रोताओं से एक आग्रह भी कि राकेश भाई को जरूर सुने अगर माई भाषा को लेके उनके मन में जरा भी स्नेह जिंदा हो, रही बात गीतों की तो ये मेरा वादा है कि उनके गीतों की गली में प्रवेश कर लेने के बाद आप उनके मुरीद होकर ही निकलेंगे।

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