अब सवालो के घेरे में चुनाव आयोग क्यों…? क्यों लगे इतने आरोप…? - COVERAGE INDIA

Breaking

Tuesday, May 21

अब सवालो के घेरे में चुनाव आयोग क्यों…? क्यों लगे इतने आरोप…?

कवरेज इण्डिया न्यूज़ डेस्क।    
17 वीं लोकसभा के चुनाव खत्म हो गये और पूरा देश २३ के नतीजो का इन्तजार कर रहा है। १० मार्च को चुनाव की घोषणा से पहले ही चुनाव आयोग विवादों के घेरे में रहा। और जैसे जैसे चुनाव आगे बढ़ते गये आयोग पर आरोप भी बढ़ते गये…! शायद ही ये पहली बार था की आयोग पर न सिर्फ एक दल लेकिन तकरीबन सभी दलों ने आयोग पर जैम कर आरोप लगायें। विशेष कर शहीद जवान और बालाकोट एयर स्ट्राइक करनेवाले जवानों के नाम पर प्रधानमंत्री ने वोट मांगे लेकिन आयोग ने कई दिनों बाद फैंसला दिया की इसमें कोई आचारसंहिता का भंग नहीं होता…! आयोग में सर्वसम्मति है ऐसा लग रहा था लेकिन सीबीआई और अन्य केन्द्रीय संस्थानों की तरह आयोग में भी मतभेद सतह पर आये। लवासा नामक एक चुनाव कमिशनर ने चुनाव खत्म होते होते आयोग की मीटिंगों में जाना बंद कर दिया। क्योंकि मुख्य आयोग सुनील अरोरा उनका अलग अभिप्राय रिकार्ड में नहीं ले रहे थे। प्रधानमंत्री को हर बार दिए क्लीन चिट में लवासा राजी नहीं थे। वे क्लीनचिट के खिलाफ थे लेकिन उनकी यह बात आयोग के रिकार्ड में दर्ज नहीं की गई। आखिर जब आयोग का भांडा फूटा तब मुख्य आयोग ने कहा की हाँ, मतभेद है…!
देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी या तो उनकी याददाश्त ठीक नहीं या वे कोई अपनी अलग खिचड़ी पकाने के चक्कर में उन्होंने आयोग के काम की भूरी भूरी प्रशंसा की। आयोग के काम को परफेक्ट बताया। आयोग ने अच्छा काम किया ऐसा प्रमाण पत्र भी दे डाला….! क्या प्रणवदा को ये नहीं लगा की आयोग ने चुनाव के दिन ही किसी को हिंदुत्व के प्रचार की अनुमति क्यों दी….? क्या शहीद जवानों के नाम पर वोट मांगे जा सकते थे…? चुनाव के दौरान तो प्रणवदा न जाने कहा थे लेकिन चुनाव खत्म होते ही मैदान में आ गये। क्या वे किसी को अच्छा लगाने के लिए आयोग को प्रमाणित कर रहे है क्या…? जो भी हो उनके मन की बात वो ही जाने और जो उनके मन की बात सुन रहा हो वे ही जाने। निष्पक्ष रूप से देखा जाय तो आयोग पर लगे इतने सारे आरोप कलंक के सामान है। अभी तो ओर भी आरोप लग सकते है जब मतगणना शुरू होंगी और नतीजे आने शरू होंगे तब इ वी एम् को लेकर आयोग पर ठीकरा फोड़ना मानो तय है।
इसी आयोग ने आप पार्टी के २० विधायको की सदस्यता रद्द कर दी थी जो बाद में आयोग का फैंसला गलत साबित हुवा था। किसी नेता की रैली खत्म होने का इन्तजार करना और घोषणा रोके रखना ये काम भी इसी काल के आयोग में हुवा। एक समय था की चुनाव आयोग के सामने अच्छे अच्छो की पूंगी बंद हो जाती थी। आयोग के सामने किसीको बोलने की हिम्मत नहीं होती थी। नेतागण आयोग से डरते थी आज आयोग महा नेता पर निर्भर है। महा नेता को कह नहीं सके की पूजापाठ तो १९ के बाद भी हो सकते है, कपाट तो खुल ही गये है….लेकिन इतना कहने की हिम्मत नहीं बटोर पाया आयोग और आदर्श आचारसंहिता आँखे मूंदे देखती रही की देवो के देव के मंदिर में भी कोई कैसे रेड कार्पेट पर चलता रहा और न सिर्फ आयोग लेकिन किसी धर्माचार्यों ने इसका विरोध नहीं किया। मंदिर कोई इवेंट है की वहा भी आपको लाल कालीन पर चलने का शौख़ लगा….? यदि नए भारत में भी ऐसे ही आयोग रहे तो आदर्श आचारसंहिता की कोई जरुरत ही नहीं रहेंगी। आयोग आत्मचिंतन करे तो लवासा की तरह मन को शान्ति मिल सकती है की हाँ मैंने हिम्मत के साथ कहा था की ये गलत है इसे रिकार्ड पर लाइए….! वैसे भी इस आयोग को देश के चुनावी इतिहास के पन्नो पर यदि कमजोर आयोग के रूप में किसी ने दर्ज किया हो तो उसमे कोई गलत नहीं…! आयोग तेरी यही कहानी, किसी ने किया भरपूर उपयोग और आँखों में आने न दिया पानी….! जय हो केदारबाबा की…!

Our Video

MAIN MENU