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Sunday, May 26

कांग्रेस का अगला कदम शुन्य या वापसी ?


कवरेज इण्डिया न्यूज़ डेस्क।  
निश्चित तौर से कांग्रेस के जिम्मेदारों ने अपनी हरकतो, बदजुबानी और भारतीय संस्कृति और आस्था से झुठा दिखावा, जनता से बढ़ती कांग्रेस की दूरी ने देश में एक छत्र लम्बे अरसे तक राज करने वाली कांग्रेस को बड़ा सबक दिया है। 2014 के बाद कांग्रेस का ग्राफ जनता के बीच लगातार गिरा और गिरता जा रहा है। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का जनता से दूर होना अपनी जिम्मेदारी से भागना आज उसे बड़ा मंहगा साबित हो रहा है। उत्तर प्रदेश से ही अगर कांग्रेस के पतन की बाॅत शुरू की जाए तो सबसे पहले उत्तर प्रदेश के दिग्गज कांग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी की चर्चा कर ली जाए व्यापक जनाधार, कुशाग्र बुद्धि, धन और जनबल होने के बाद भी प्रमोद तिवारी पिछले 15 वर्षाें से कांग्रेस के प्रति सक्रियता नही निभा पा रहे है। सभी दलों में मजबूत घुसपैठ रखने का महारथ इन्हें हासिल है। अब बाॅत कर सिने स्टार राजबब्बर के बारे में तो लम्बे समय से प्रदेश अध्यक्ष रहने के बावजूद प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर ने कितनी बार प्रदेश के जिलाध्यक्षो के साथ बैठक की है। कितने जनपदों में साधरण या आम सभाए कर कांग्रेस को सीधे जनता से जोड़ने का प्रयास किया है यह उगलियों पर गिना जा सकता है। यही हाल मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तराखण्ड, राजस्थान,छत्तीसगढ़ जैसे तमाम राज्यों का है। इसके बाद भी अगर कांग्रेस को 2014 की 44 के बाद 2019 में 52 सीटे मिली तो यह उसका परम सौभाग्य है।

 कांग्रेस 2024 में जीरोे का फिगर लेगी या फिर वापसी करेगी यह तय करने का वक्त आ चुका है। पाॅच साल का समय लम्बा समय है। निश्चित तौर से भाजपा को एक छ.त्र बहुमत देकर जनता ने काटों भरा ताज दिया है। लम्बे चैड़े वायदे भी भाजपा ने किये है। इन वायदों की भरपाई इतनी आसान नही है। निश्चित तौर से बेरोजगारी, राममंदिर और धारा 370 जैसे कई अहम मुद्दे पर सरकार को ठोस कदम उठाने है। जिस हिसाब से देश में जनसंख्या है उस हिसाब से देश समस्याओं का अम्बार भी है। सरकारी सेवाओं की समाप्ति का दौर चल पड़ा है। ठेकापट्टी पर मिलने वाली नौकरियों में बधुवा मजदूरों जैसी स्थिति से देश का युवा दो चार हो रहा है। ऐसे कई बड़े मुद्दे है जिन पर इन पाॅच वर्षो पर मोदी सरकार को काम करना है। निश्चित तौर पर जो वायदे मोदी सरकार ने किये है उन्हें पूरा करना आसान नही है। ऐसे में कांग्रेस को इस बाॅत पर मंथन करने की जरूरत है कि अब वह अपने गिरते वाजूद को वापस हासिल करने के लिए कया करे ? आम जनता नियमित संवाद, उनके पत्रों के जबाब, बुर्जगों हो रहे नेताओं से आर्शीवाद लेने की कला कांगे्रस को भाजपा से सीखनी होगी जिस तरह से भाजपा ने पूर्व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाडी और मुरली मनोहर जोशी को आर्शीवाद की श्रेणी रखा है। कांग्रेस को भी इसी तर्ज पर आगे आकर काम करना होगा। 

शत्रुघन सिन्हा हो या फिर यशवंत सिन्हा को लेकर जो निर्णय भाजपा ने लिए वैसे ही निर्णय कांग्रेस को लेना होगा भले ही उसमें गांधी परिवार हो या फिर अन्य कोई राजघराने से जुड़ा पदाधिकारी हो। कांग्रेस को इस बाॅत पर भी काम करना होगा कि हवा में बयान देने से पहले, सरकार के प्रति केवल नकारात्मक, बिना तथ्य के आरोप लगाने से पहले आरोपों की सत्यता और प्रमाण हासिल करने के बाद ही कुछ बोलने का संकल्प लेना होगा। राहुल गांधी बयान बच्चे पैदा करने वाला हो या आलू से सोना, नवजोत सिद्धु की बाॅत करे या फिर दिग्विजय सिंह की चर्चा करे सभी ने अपने और कांग्रेस की कब्र खोदने में कोई कमी नही रखी। इसके बावजूद यह कहा जाए कि 1986 में मात्र दो सांसद वाली भाजपा अपनी रणनीति, जनता से जुड़े विचारों, देश की संस्कृति, देश की आस्था का मुद्दा साथ लेकर आज शैने शैने उस ताकतवर स्थिति में पहुंच चुकी है जिसकी कल्पना शायद स्वंय भाजपा के लोगों को नही रही होगी। निश्चित तौर पर अपने 2014 के घोंषणा पर में कांग्रेस ने जनता को रिझााने का पूरा किया किया। हर साल गरीब तबके के 20 फीसदी लोगों के खाते में 72,000 रुपये डाले जाएंगे। कांग्रेस ने इस स्कीम के लिए गरीबी पर वार, हर साल 72 हजार के नारे की बाॅत करे या फिर 2. 22 लाख सरकारी नौकरी, 10 लाख लोगों को ग्राम पंचायतों में रोजगार देने का वायदे से लेकर 3 साल तक युवाओं को कारोबार करने के लिए किसी से भी अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। 

मनरेगा में काम के दिनों को 100 से बढ़ाकर 150 करने का ऐलान,किसानों के लिए अलग से बजट, किसानों का कर्ज न चुका पाना अपराध के दायरे से बाहर करने और जीडीपी का 6 फीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च किया जाएगा। यूनिवर्सिटीज, आईआईटी, आईआईएम समेत टॉप संस्थानों तक गरीबों की पहुंच को आसान करने का वायदे सीधे जनता से जुड़े थे लेकिन इसी बीच कांग्रेस की नई महासचिव प्रियंका गांधी का भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर को करिश्माई नेता बताना और उनसे मिलने जाना जनता को नागवार गुजरा। जाति विशेष के प्रति कांग्रेस का वोट बैंक का नजरिया अब नही चलेगा, हर वर्ग का साथ कांग्रेस को हाल हाल में लेना होगा। आम चुनाव के अंतिम नतीजे आने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि विपक्ष की अगुआई कर रही कांग्रेस इस बार भी लोकसभा में नेता विपक्ष का पद हासिल नहीं कर सकेगी। भले ही कांग्रेस के खाते में पिछली बार से आठ सीटें अधिक दिख रही हों, लेकिन कुल मिलाकर उसका प्रदर्शन उसकी दयनीय दशा को ही बयान कर रहा है। यदि एक क्षण के लिए केरल और तमिलनाडु में सहयोगी दलों के सहारे उसके प्रदर्शन को किनारे कर दें तो उसकी हैसियत क्षेत्रीय दल जैसी ही दिखेगी।सबसे पुरानी और लंबे समय तक केंद्र में शासन करने वाली कांग्रेस की ऐसी दुर्दशा इसलिए ठीक नहीं, क्योंकि लोकतंत्र एक मजबूत विपक्ष की भी मांग करता है और आज के दिन कोई क्षेत्रीय दल इस मांग को पूरा करने में समर्थ नहीं। वह कर भी नहीं सकता, क्योंकि ऐसे दल राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर संकीर्ण रवैया अपनाते हैं। 

हार के बाद एक फिर कांग्रेस घूम-फिर कर इसी नतीजे पर पहुंची है कि पार्टी को गांधी परिवार के नेतृत्व पर पूरा भरोसा है। आखिर कौन नहीं जानता कि 2014 में पराजय के कारणों की खोज के लिए गठित एंटनी समिति की रपट आज तक बाहर नहीं आ सकी ? यदि इस बार भी पिछली बार जैसा होता है तो कांग्रेस का भविष्य गंभीर खतरे में होगा।कांग्रेस को एक और करारी हार के बाद खुद में व्यापक बदलाव के लिए कमर कसनी होगी। यह बदलाव आत्ममंथन से ही संभव होगा, न कि दरबारी संस्कृति का परिचय देने से। जरूरी केवल यह नहीं कि गांधी परिवार इस संस्कृति में रचे-बसे लोगों को किनारे कर पार्टी को ईमानदारी से आत्ममंथन करने का मौका दे, बल्कि उससे जो हासिल हो उसेस्वीकार भी करे। इससे इन्कार नहीं कि गांधी परिवार के बगैर कांग्रेस का काम नहीं चल पाता, लेकिन सच यह भी तो है कि परिवार के प्रभुत्व के चलते जनाधार वाले सक्षम नेता एक दायरे से ऊपर नहीं उठ पाते। कई बार तो उन्हें जानबूझकर उठने नहीं दिया जाता। गांधी परिवार को यह भी समझना होगा कि मजबूत विपक्ष के साथ ही उसका सकारात्मक होना आवश्यक है। बीते कुछ समय में कांग्रेस ने जैसी नकारात्मक राजनीति का परिचय दिया उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। 

सबसे खराब बात यह रही कि नकारात्मक राजनीति की अगुआई खुद राहुल गांधी ने की। वह केवल चैकीदार चोर का नारा ही नहीं उछालते रहे, बल्कि प्रधानमंत्री के प्रति अभद्र भाषा का भी इस्तेमाल करते रहे। क्योकि कांग्रेस का आधार गांधी रहा है इसलिए उसे अब 30 जनवरी 1948 को कांग्रेस कार्यसमिति पर महात्मा गांधी के इस प्रस्ताव पर विचार करना होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि कांग्रेस अपने आप को राजनैतिक पार्टी की जगह एक सामाजिक आन्देालन के रूप में स्थापित करें। राष्ट्रीय कांग्रेस का नाम लोक सेवा संघ होना चाहिए। कांग्रेस को इग्लैण्ड से सबक लेना चाहिए वहाॅ जिस दल का नेता पार्टी के काम करने में अक्षम हो जाता है तो वह स्वंय पार्टी छोड़कर अलग हो जाता है।

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